कुंडली में सूर्य से बनने वाले योग
वासी योग
परिभाषा – चन्द्रमा के अतिरिक्त कोई भी ग्रह या कई ग्रह सूर्य से बारहवें स्थान में विद्यमान हों तो वासी योग होता है।
फल – वासी योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने कार्य में दक्ष होता है।
यदि सूर्य से बारहवें भाव में शुभ ग्रह हो तो जातक प्रसन्न, निपुण, विद्यवान, गुणी और चतुर होता है। जीवन में वह हर समय प्रसन्नचित्त एवं आनन्दित रहता है। पारिवारिक दृष्टि से वह सुखी, यश प्राप्त करने वाला एवं शत्रुओं का संहार करने वाला भी होता है।
परन्तु यदि सूर्य से बारहवें स्थान पर पापग्रह हो तो जातक अधिकतर अपने निवास स्थान से दूर ही दूर रहता है तथा जीवन में कई ऐसी भयंकर भूलें कर देता है कि जिससे वह संतापित एवं दुखी रहता है। उसके मन में हर समय बदला लेने, रक्तपात एवं लूटमार करने की ही भावना रहती है। उसके चेहरे से भी क्रूरता झलकती है।
टिप्पणी – इस योग में शुभ ग्रहाँ एवं पाप ग्रहों का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। यदि सूर्य से बारहवें भाव में शुभ एवं अशुभ ग्रहों का मिश्रण हो तो मिश्रित फल समझना चाहिए ।
वेशि योग
परिभाषा – चन्द्रमा के अतिरिक्त कोई भी ग्रह या कई ग्रह सूर्य से दूसरे भाव में स्थित हों तो वेशि योग होता है।
फल – यदि सूर्य से दूसरे भाव में शुभ ग्रह स्थित हो तो शुभ वैशि योग तथा पाप ग्रह हो तो अशुभ वेशि योग कहलाता है।
शुभ वेशि योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सौम्य आकृति का होता है तथा भाषण द्वारा लोगों को प्रभावित करने की कला में वह दक्ष होता है। ऐसा व्यक्ति नेतृत्व में भी दक्ष होता है तथा उसके कार्यों से जनता उस पर श्रद्धा रखती है । आर्थिक दृष्टि से ऐसा जातक सम्पन्न होता है तथा जीवन में विविध भोगों को भोग करता है। शत्रुओं को नीचा दिखाने तथा उन्हें परास्त करने या समूल नष्ट करने में जातक कुशल होता है ऐसे व्यक्ति का कई लोग अनुकरण करते हैं। जातक अपने कार्यों से देश और विदेश में सर्वत्र प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
अशुभ वेशि योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति दुष्टों की संगति करता है तथा उन्हीं की संगति में आनन्द प्राप्ति समझता है । उसके दिमाग में हर समय कुचक्र घूमते रहते हैं तथा वह आजीविका के लिए परेशान रहता है। ऐसा जातक अपने दुष्ट कार्यों एवं दुष्ट स्वभाव के कारण कुख्यात भी होता है ।
उभयचरिक योग

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
परिभाषा – यदि किसी कुण्डली में सूर्य से दूसरे तथा बारहवें दोनों घरों में ग्रह विद्यमान हो तो उभयचरिक योग बनता है ।
फल – यदि सूर्य से द्वितीय भाव तथा द्वादश भाव दोनों में शुभ ग्रह हों तो शुभ ‘उभयचरिक योग’ में जन्म लेने वाला व्यक्ति सहनशील होता है तथा प्रत्येक प्रकार की परिस्थिति को सहन करने में सक्षम होता है।
ऐसा व्यक्ति न्याय करने में निपुण होता है तथा वादी-प्रतिवादी को समान रूप से देखता हुआ निष्पक्ष निर्णय करता है। पूर्ण बलवान, स्थिर, अविचलित एवं पुष्ट ग्रीवा वाला होता है।
अशुभ उभयचरिक योग में जन्म लेने पर व्यक्ति पाप करने वाला, मन में कपट भाव रखता हुआ झूठा न्याय करने वाला, दूसरों के आधीन रहने वाला एवं दरिद्र जीवन बिताने वाला होता है ।
टिप्पणी – उभयचरिक योग में सूर्य तथा उसके दोनों ओर ग्रह होना आवश्यक है, परन्तु उन ग्रहों में चन्द्र की गणना नहीं है अर्थात् चन्द्र के अतिरिक्त कोई भी ग्रह हो ।
संस्कृत के ज्योतिष ग्रन्थों में इसके फल के लिए ‘नृपति तुल्य’ शब्द का प्रयोग किया है। बदली हुई परिस्थितियों में व्यक्ति राजनीति में दक्ष, मन्त्री या सेक्रेटरी स्तर का व्यक्ति हो सकता है ।
बुध-आदित्य योग
परिभाषा – कुण्डली में कहीं पर भी सूर्य और बुध एक साथ पड़े हों तो बुध-आदित्य योग बनता है ।
फल – जिसकी कुण्डली में बुध और सूर्य एक ही स्थान पर बैठे हों, वह अत्यन्त बुद्धिमान होता है तथा प्रत्येक कठिन समस्या को चतुराई से हल करने में समर्थ होता है। जातक की सर्वत्र प्रसिद्धि होती है और वह अपने कार्यों से विख्यात होता है। जीवन में ऐसा व्यक्ति पूर्ण सुख भोगता है ।
टिप्पणी – सामान्यतः सूर्य के साथ कोई भी ग्रह बैठकर अस्त हो जाता है या उसके प्रभाव से क्षीण हो जाता है। स्पष्टतः सूर्य के साथ बैठा हुआ ग्रह या उसके द्वारा देखा गया ग्रह पूर्ण फल प्रदान नहीं कर सकता, परन्तु बुध अकेला ऐसा ग्रह है, जो सूर्य के साथ बैठकर भी न तो अस्त होता है और न उसका प्रभाव ही क्षीण होता है, अपितु उल्टा वह सूर्य के साथ बैठकर उच्च शुभ फल प्रदाता हो जाता है ।
परन्तु इस योग का फल तभी चरितार्थ होता है, जब बुध 10 अंशों से कम न हो। इससे कम होने पर बुध निर्बल बन जाता है और पूर्ण फल नहीं दे पाता ।
Related Posts
0 Comments