लाल किताब से फलादेश करने की विधि
कुण्डली देखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कुण्डली देखने वाले को इस बात का ज्ञान होना कि कौन सा ग्रह नीच का है। या उच्च का है और हर भाव के बारे में कि कौन से भाव से आपके शरीर का अंग या जीवन की जरूरी वस्तुएं आती हैं और ग्रहों और भावों से कौन सा कौन सा रिश्तेदार सम्बन्धित का ज्ञान होना आवश्यक है। अगर ये ज्ञान नहीं होगा तो कुण्डली देखना बेकार साबित होगा।
एक अच्छी लाल किताब का ज्ञानी आपकी कुण्डली के बिना भी आपके भूतकाल और भविष्य काल के बारे में बता सकता है। आपके शरीर के अंगों को देख कर और आपके रिश्तेदारों सम्बन्धियों के बारे में पूछ कर ।
लाल किताब की कुण्डली में लग्न मेष ही होता है। चाहे कोई भी लग्न हो अगर कन्या लग्न हो तो भी 6 न0 को हटा कर 1 न0 का लिख दिया जाता है। ये सिद्धांत वैदिक ज्योतिष के एकदम उल्टा हैं। दूसरे कुण्डली पढ़ने वाले का ध्यान राशि के बजाय भावों पर जायेगा।
लाल किताब में राशि की जगह भावों को अधिक महत्व दिया गया है। इसका ये मतलब नहीं है कि राशियों का स्थान नही है। जैसे कि कई ज्योतिष विद्वान आपकी काल पुरूष कुण्डली बना लेते हैं। तभी फलादेश करते हैं। काल पुरूष कुण्डली का मतलब ही है कि भावों को भी ध्यान में रखना है।
इन ज्योतिष विद्वानों को चाहे लाल किताब का ज्ञान हो या न हो तब भी ये काल पुरूष कुण्डली अवश्य बनाते हैं। इसे चाहे आप लाल किताब के कुण्डली कहें या काल पुरूष कुण्डली कहें दोनो ही एक ही है। जब तक आप राशि भावों और ग्रह को एक साथ नही समझेंगे तब तक आप का फलादेश सटीक नहीं बैठेगा। लाल किताब में भी जिक्र आता है कि फला ग्रह नीच राशि में बैठा है या उच्च राशि में विराजमान है। इसलिए राशि और भावों को समझ कर फलादेश करना चाहिये।
जैसे कि लाल किताब में साथी ग्रह का जिक्र है । जैसे कि सूर्य मकर राशि में दसवें घर में बैठा हो और शनि पाँचवें घर में सिंह राशि में हो तो साथी ग्रह कहलायेंगे। दोनो ग्रह एक-दूसरे के घर में और राशि में बैठे हैं। अब ये दोनों ग्रह आपस में दुश्मनी नहीं करेंगे। क्योंकि अब दोनो ग्रह एक-दूसरे के किरायेदार होंगे।
एक ही ग्रह को देख कर फलादेश न करें न ही समझें। सभी ग्रहों का अध्ययन करने के बाद ही फलादेश करें और समझें।
कोई भी उपाय 43 दिन 43 हफ्ते या 43 माह लगातार करें। एक उपाय पूरा होने के बाद दूसरा उपाय 2 हफ्ते बाद शुरू करें। दबाने वाले उपायों में ध्यान रखें जिस औजार से खोदें उसे भी वहीं छोड़ आएं।
उपाय करने से पहले अच्छी तरह समझ लें कि जिस ग्रह का उपाय करने जा रहें हैं। वह ग्रह खराब फल दे रहा है। यदि ऐसा न हुआ तो अच्छा ग्रह भी खराब हो जाएगा।
नोट – जहाँ पर लिखा है कि फलां फलां वस्तुएं का सुख कम होगा इसका मतलब यह नहीं है कि वो वस्तुएं मिलेगी ही नहीं वस्तुएं मिलेगी परंतु उनका नुकसान भी होगा। जैसे: बड़े भाई का सुख नहीं होगा। बड़े भाई बहन होंगे लेकिन आपस में प्यार नहीं होगा। या परदेश में निवास करते होंगे या किसी एक की कम उम्र में मृत्यु हो गई होगी। ऐसा ही सब वस्तुऐं और भावों के बारे में समझें ।


अब कुण्डली को बारीक गहराई से अध्ययन करेंगे। चन्द्र काल पुरुष कुण्डली या लाल किताब कुण्डली के अनुसार अपने घर में और मित्र राशि धनु में उच्च का है।

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ऐसे ही शनि भी अपने घर में और उच्च राशि मिथुन में स्थित है। लेकिन शनि की सप्तम दृष्टि चन्द्र पर पड़ रही है। जिसके कारण चन्द्र अशुभ हो रहा है। इस कुण्डली वाले जातक को चन्द्र के उच्च के कारण छोटी उम्र में सारे सुख चौथे भाव के मिले पर शनि की दृष्टि के कारण वर्ष 2004 में डेढ़ करोड़ का नुकसान हो गया। क्योंकि धनु राशि का स्वामी गुरु भी नीच राशि मकर में स्थित है इसलिए चन्द्र को कोई सहायता नहीं मिल रही है।
राहु धनु राशि में चौथे घर में स्थित है। चौथे घर का स्वामी गुरू नीच राशि में है इसलिए राहु भी नीच का हो जायेगा। राहु केतु छाया ग्रह है इसलिए जिस राशि में स्थित होंगे उस राशि का स्वामी नीच होगा तो राहु केतु नीच फल करेंगे। अगर उच्च का होगा तो उच्च का फल करेंगे।

लाल किताब में भाव के साथ-साथ राशियों का भी महत्व है। अगर राशियों का महत्व न होता तो एक ही ग्रह एक ही भाव में शुभ और अशुभ फल कैसे कर सकता है। इसलिए कोई भी कुण्डली का अध्ययन करते वक्त राशियों का भी अध्ययन करना आवश्यक होता है।
वर्षफल कुण्डली का बारीकी से अध्ययन किया जाये तो उसके सारे भेद खोल देती है। जातक को वर्ष कुण्डली पर नज़र डालें तो वो भी अच्छी नहीं है। 12वें भाव के ग्रह दूसरे भाव में आकर धन हानि कर रहे हैं। चौथे भाव के ग्रह 12वें भी शुभ नहीं है। अष्टम भाव का मंगल दशम भाव में व्यापार को हानि कर रहा है। 32वें वर्ष और 33वें वर्ष में मंगल शुक्र की दशा होगी। शुक्र कन्या राशि में नीच का है। इसलिए जातक को 32वें और 33वें वर्ष में हानि उठानी पड़ी।
लाल किताब एक अदभुत् एवं निराली किताब है। लाल किताब को अच्छे से समझना इतना आसान नहीं जितना आम लोग समझते हैं। लाल किताब को समझने के लिए बहुत ही बारीकी से अध्ययन करना पड़ता है।
लाल किताब से जन्मकुण्डली देखने की विधि
जब भी आप कोई कुण्डली देखें सबसे पहले उसका ग्रहों और राशियों का अध्ययन करें। फिर वर्षफल कुण्डली बनाएं।


इस जातक की जन्मकुण्डली में शनि सप्तम भाव में नीच राशि में बैठा है। जिसके कारण उसकी शादी में परेशानियां आनी चाहिए। क्योंकि सप्तम भाव शादी का घर है। इस जातक की दो या चार जून में शादी तय हुई (26वें साल) और शदी टूट गई। रूपये 6 लाख का नुकसान हुआ।
वर्ष कुण्डली के हिसाब से चौथे भाव का चन्द्र आठवें भाव में चला गया जो हानिकारक है और नौवें भाव के शुक्र, सूर्य बारहवें भाव में चले गये जो खर्चे का भाव है। जो शनि नीच का बैठा है। धन भाव में चला गया। तो धन का नुकसान कर रहा है। शुक्र की महादशा चल रही है। शुक्र में शुक्र की दशा थी। जब इनकी शादी टूटी। शुक्र भी जन्म कुण्डली में नौवें भाव में सूर्य के साथ पीड़ित है। इसलिए शुक्र की दशा भी जातक के लिए अच्छी नहीं थी।

उदाहरण कुण्डली संख्या 3 में दसवें भाव में मीन राशि स्थित है। जिसमें राहु बैठा है और मीन राशि का स्वामी बृहस्पति नौवें भाव में कुम्भ राशि में स्थित है। बृहस्पति के लिए कुम्भ राशि शुभ नहीं होती है। साथ ही नीच शनि बृहस्पति को देख रहा है। मंगल भी दसवें भाव को नीच दृष्टि से देख रहा है। इसलिए दसवें भाव के नुकसान होंगे। दसवें भाव से राज दरबार, सरकारी, हिसाब-किताब देखा जाता है।

जातक को 2004 अप्रैल में किसी गबन के कारण जातक को जेल जाना पड़ा। ये जातक का 54वां साल था। काल पुरुष (लाल किताब) कुण्डली से दसवें घर का मालिक शनि सिंह राशि में नीच का बैठा है। दसवां घर बहुत ज़्यादा पीड़ित होने के कारण जातक की जमानत समय पूरा होने पर हुई। 54वें वर्ष में जातक का बृहस्पति दसवें भाव में आया था, जो नीच का है। दसवें भाव का राहु बारहवें भाव में (खर्चे, हानि के घर चला गया जो ठीक नहीं है, जिसने खूब खर्चा करवाया।

जातक की जमानत 55वें वर्ष शुरू होने पर हुई। 55वें वर्ष की कुण्डली देखेंगे तो शनि अपने 11वें भाव में ऊंच का आ गया। चन्द्र दूसरे भाव में ऊंच का है और शुक्र 12वें भाव में ऊंच का है। राहु भी चौथे भाव में शांत बैठा है, क्योंकि चन्द्र के भाव में कोई भी ग्रह ज्यादा परेशान नही करता है। बृहस्पति भी छठे स्थान में ईश्वरीय सहायता प्रदान कर रहा है। इसलिए जातक की जमानत हो गई। महादशा पर भी ध्यान दिया जाये। गुरु की महादशा थी। गुरु कुंभ राशि में ठीक नहीं बैठा है, शनि से पीड़ित है। गुरु की दशा में जातक को ये सब मुसीबतें झेलनी पड़ी। जैसे ही गुरू में सूर्य की दशा शुरू हुई। सूर्य लग्न में (जन्म कुण्डली में) शुभ बैठा हुआ है।
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