लाल किताब किताब की दशाएं

इस ब्रह्माण्ड में 12 राशियां और 27 नक्षत्र है। 7 ग्रह और दो छाया ग्रह है। हर एक ग्रह उपने निर्धारित समय तक प्रत्येक राशि में रह कर अपना चक्र पूरा करता है। जैसे

शनि ग्रह एक राशि में ढाई वर्ष रहता है और 30 वर्ष में अपना चक्र पूरा करता है।

गुरु एक वर्ष एक राशि में रहता है और 12 राशियों का चक्र 12 वर्ष में पूरा करता है।

राहु और केतु 18 माह एक राशि में रहते हैं और 18 वर्ष में अपना-अपना चक्र पूरा करते हैं।

सूर्य एक राशि में एक माह रहता है और एक वर्ष में 12 राशियों का चक्र पूरा करता है।

चन्द्र ग्रह सबसे तेज गति का ग्रह है चन्द्र ग्रह एक राशि में सवा दो दिन रहता है और 27 दिन में 12 राशियों का चक्र पूरा करता है।

मंगल ग्रह एक राशि में लगभग 45 दिन रहता है और लगभग 540 दिन में 12 राशियों का चक्र पूरा करता है।

बुध ग्रह एक राशि में लगभग 25 दिन रहता है और लगभग 300 दिन में 12 राशियों का चक्र पूरा करता है।

शुक्र ग्रह एक राशि में लगभग 30 दिन रहता है और 300 दिन में 12 राशियों का चक्र पूरा करता है।

लाल किताब के अनुसारं जब बच्चा पैदा होता है उसके पहले 6 वर्ष शनि का प्रभाव रहता है। जैसे किसी का जन्म 01-05-1945 है तो उस पर 30-04-1951 तक शनि का प्रभाव रहेगा

इस से आगे के 6 वर्ष में राहु का प्रभाव रहेगा यानि के बच्चे के सातवें वर्ष से लेकर 12वें वर्ष तक उसके बाद 3 वर्ष केतु को दिये गये हैं यानि 13, 14 और 15वें वर्ष, फिर 6 वर्ष गुरु के होते हैं यानि 16वें वर्ष से लेकर 21वें वर्ष तक उसके बाद 2 वर्ष सूर्य के हैं अर्थात् 22वें और 23वें वर्ष बच्चे पर सूर्य ग्रह का प्रभाव रहेगा।

24वां वर्ष चन्द्र ग्रह का है इस वर्ष चन्द्र ग्रह का प्रभाव रहेगा। शुक्र ग्रह को 25वां, 26वां और 27वां वर्ष दिया गया है। इसी तरह मंगल ग्रह को छः वर्ष यानि 28 वें वर्ष से लेकर 33वें वर्ष तक। आखिर में बुध को दो वर्ष दिये गये हैं यानि 34, 35वें वर्ष ।

इसी तरह ये 1 चक्र पूरा होगा तब 36 वर्ष से फिर से दूसरा चक्र शुरू होगा ।

कोई ग्रह जब भी बहुत खराब या अच्छा होगा तो अपनी उम्र 10 के आधे में भी अपना प्रभाव डालेगा जैसे किसी जातक का बुध ग्रह बहुत ज्यादा खराब है तो उसकी उम्र के 17वां वर्ष पर भी बुध ग्रह खराब प्रभाव डालेगा। इसी तरह सब ग्रहों के प्रभाव को समझना चाहिये।

लाल किताब किताब की दशाएं

जैसे ज्योतिष में विशतरी दशा, योगिनी दशा होती है। वैसे ही लाल किताब में भी दशायें होती हैं। जैसे किसी का जन्म 01-01-2003 को हुआ है तो उस पर 31-12-2008 तक शनि की दशा होगी जिस में पहले दो वर्ष शनि में राहू के होंगे 01-01-2003 से 31-12-2004 तक फिर दो वर्ष बुध के होंगे 01-01-2005 से 31-12-2006 तक और अन्त के दो वर्ष शनि के होंगे 01-01-2007 से 31-12-2008 तक। अगर शनि लाल किताब के अनुसार कुण्डली में अच्छा है तो 6 वर्ष जातक के माँ पिता के लिए अच्छे होंगे।

वर्ष फल में शनि जिस-जिस भाव में भ्रमण करेगा वैसे-वैसे फल देगा। शनि में राहु के वक्त राहु अच्छे भाव में भ्रमण करेगा तो अच्छे फल देगा नहीं तो खराब फल करेगा। शनि में बुध के अन्तर काल में अगर बुध अच्छे भाव में भम्रण करेगा तो अच्छे फल करेगा नहीं तो खराब करेगा। शनि में शनि के अन्तर काल में शनि जिस भाव में भम्रण करेगा वैसे ही फल करेगा।

कुण्डली में शनि शुभ होगा और वर्षफल में भी शुभ भाव में भ्रमण करेगा बहुत ही शुभ फल देगा। अगर अशुभ होगा और अशुभ भाव में भ्रमण करेगा तो बहुत अधिक शुभ फल देगा। शनि कुण्डली में शुभ होगा और भ्रमण अशुभ भाव में करेगा तो मिश्रित फल देगा। ऐसे ही अशुभ होगा और भ्रमण शुभ भाव में करेगा तो भी मिश्रित फल देगा।

शनि में राहू के समय दोनो ग्रह शुभ भाव में होंगे और वर्षफल शुभ भाव में भ्रमण करेगा तो बहुत अधिक शुभ फल करेगा। एक शुभ होगा एक अशुभ होगा तो मिश्रित फल करेंगे या जिस भाव में भ्रमण करेंगे उस भाव के अनुसार शुभ या अशुभ फल करेगे। ऐसे ही शनि में बुध और शनि में शनि की अंतरकाल को समझें ।

शनि दशा के बाद राहु की दशा का समय होगा जो कि 6 वर्ष का होगा 01-01-02009 से 31-12-2014 तक का होगा अगर जन्म कुण्डली में राहु अच्छा होगा तो अच्छे फल, खराब होगा तो खराब फल करेगा।

राहु की दशा में पहले दो वर्ष का अन्तर मंगल का होगा 01-01-2009 से लेकर 31-12-2010 तक का होगा। मंगल और अच्छे भाव में भम्रण करेगा तो अच्छे फल करेगा नहीं तो खराब फल करेगा।

राहु की दशा में फिर दो वर्ष केतु के होंगे 01-01-2011 से लेकर 31-12-2012 तक का समय केतु का होगा अगर केतु और राहू शुभ भाव में भम्रण करेगा तो शुभ फल प्रदान करेगा अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

राहु की दशा में फिर दो वर्ष खुद राहु के होंगे 01-01-2013 से लेकर 31-12-20014 तक का समय होगा यदि राहु शुभ भाव में भम्रण करेगा तो शुभ फल प्रदान करेगा अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

राहु की दशा के बाद केतु की दशा आरम्भ होती है जो कि तीन वर्ष की है 01-01-2015 में लेकर 31-12-2017 तक की होगी केतु शुभ भाव में भम्रण करेगा तब शुभ फल करेगा। सबसे पतले केतु की दशा में शनि की अन्तर दशा होगी जो कि 01-01-2015 से लेकर 31-12-2015 तक की होगी। अगर शनि केतु शुभ भाव में भ्रमण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे।

फिर केतु में राहु के अन्तर दशा आरम्भ होगा जो कि एक वर्ष की होगी 01-01-2016 से लेकर 31-12-2016 तक होगी केतु और राहु शुभ भाव में भम्रण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे। अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

केतु दशा में केतु का अन्तर दशा भी एक वर्ष की होगी 01-01-2017 से लेकर 31-12-2017 तक होगी इस समय केतु शुभ भाव में भम्रण करेगा तो शुभ फल प्रदान करेगा अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

केतु के बाद बृहस्पति की दशा आरम्भ होगी जो कि 6 वर्ष की होगी 01-01-2018 से लेकर 31-12-2023 तक की होगी यदि बृहस्पति कुण्डली के शुभ भाव में बैठा हो और दशा काल में शुभ भाव में भम्रण करे तो बहुत ही शुभ फल करेगा।

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अगर कुण्डली में तो शुभ भाव में है लेकिन भम्रण खराब भाव में कर रहा है तो मिश्रित फल प्रदान करेगा ऐसे ही अगर बृहस्पति कुण्डली के खराब भाव में भम्रण कर रहा हो तो बहुत खराब फल करेगा। अगर खराब भाव में बैठा हो और शुभ भाव में भम्रण करेगा तो मिश्रित फल प्रदान करेगा।

सबसे पहले बृहस्पति में केतु की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि दो वर्ष की होगी 01-01-218 से लेकर 31-12-2019 तक बृहस्पति और केतु अगर शुभ भाव में भम्रण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे।

केतु के बाद बृहस्पति में बृहस्पति की अन्तर दशा शुरू होगी जो कि वर्ष की होगी 01-01-2020 लेकर 31-12-2021 तक होगी। अगर बृहस्पति शुभ भाव में भम्रण करेगा तो शुभ फल प्रदान करेगा अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

सबसे बाद में बृहस्पति में सूर्य की अन्तर दशा आरम्भ होगी ये भी दो वर्ष की होगी। 01-01-2022 से लेकर 31-12-2023 तक का समय होगा। बृहस्पति और सूर्य शुभ भाव में भम्रण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे।

बृहस्पति की दशा के बाद सूर्य की दशा आयेगी जो कि दो वर्ष की होगी 01-01-2024 से लेकर 31-12-2025 तक होगी अगर सूर्य कुण्डली में शुभ भाव में बैठा है और भम्रण भी शुभ भाव में कर रहा है तो बहुत अधिक शुभ फल प्रदान करेगा अगर शुभ भाव में बैठा है लेकिन भ्रमण खराब भाव में कर रहा तो मिश्रित फल प्रदान करेगा। यदि कुण्डली में खराब भाव में बैठा है। और खराब भाव में भम्रण कर रहा है तो अधिक अशुभ फल प्रदान करेगा और कुण्डली में अशुभ भाव में बैठा है और भम्रण, शुभ भाव में कर रहा है तो मिश्रित फल प्रदान करेगा।

सबसे पहले सूर्य की दशा में सूर्य को अन्तर दशा शुरू होगी जो कि 8 माह की होगी 01-01-24 में लेकर 31-08-2025 तक होगी सूर्य शुभ भाव में भम्रण करेगा तो शुभ फल प्रदान करेगा अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

सूर्य के अन्तर दशा के बाद सूर्य में चन्द्र की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि 8 माह की होगी 01-09-2024 से लेकर 30-4-25 तक होगी यदि सूर्य और चन्द्र शुभ भाव में भम्रण कर रहे होंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे।

फिर सूर्य की दशा में मंगल की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि 8 माह की होगी 01-5-2025 से लेकर 31-12-2025 तक का समय होगा अगर सूर्य और मंगल शुभ भाव में भम्रण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे। यदि शुभ भाव में हों और भ्रमण अशुभ भाव में हों तो मिश्रित फल प्रदान करेंगें।

सूर्य की दशा के बाद चन्द्र की दशा आरम्भ होगी जो कि एक वर्ष की होगी। 01-01-26 से लेकर 31-12-2026 तक होगी। चन्द्र ग्रह अगर कुण्डली में शुभ भाव में बैठा है और भम्रण भी शुभ भाव में कर रहा हो तो अधिक शुभ फल प्रदान करेगा । अगर बैठा शुभ भाव में हो और भम्रण अशुभ भाव में कर रहा हो तो मिश्रित फल प्रदान करेगा। चन्द्र यदि अशुभ भाव में बैठा हो और अशुभ भाव में भ्रमण कर रहा हो तो बहुत अधिक अशुभ फल प्रदान करेगा और चन्द्र ग्रह अगर कुण्डली में अशुभ भाव में बैठा हो और भम्रण शुभ भाव में करे तो मिश्रित फल प्रदान करेगा।

सबसे पहले चन्द्र ग्रह की दशा में बृहस्पति ग्रह की अन्तर दशा होगी जो कि चार माह की होगी 01-01-2026 से लेकर 30-04-2026 तक होगी। अगर चन्द्र ग्रह और बृहस्पति ग्रह शुभ भाव में हों तो शुभ फल प्रदान करेंगे अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे। यदि शुभ भाव में हों तो और अशुभ भाव में भ्रमण करें तो मिश्रित फल करेंगे। यदि अशुभ भाव में हों और शुभ भाव में भ्रमण करें तो भी मिश्रित फल करेंगें।

फिर चन्द्र ग्रह की दशा में सूर्य ग्रह की अन्तर दशा होगी जो कि चार माह की होगी 01-05-2027 से लेकर 31-08-2026 तक होगी। अगर चन्द्र ग्रह और सूर्य ग्रह शुभ भाव में भम्रण कर रहा होगा तो शुभ फल प्रदान करेगा अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

सबसे बाद में चन्द्र ग्रह की दशा में चन्द्र ग्रह की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि चार माह की होगी 01-9-2026 से लेकर 31-12-2026 तक का होगा। अगर चन्द्र शुभ भाव में भम्रण कर रहा होगा तो शुभ फल प्रदान करेगा। अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

चन्द्र की दशा के बाद शुक्र की दशा आरम्भ होगी जो कि 3 वर्ष की होती है जो कि 01-01-2027 से लेकर 31-12-2029 तक होगी। शुक्र ग्रह अगर कुण्डली में शुभ भाव में होगा और दशा काल में शुभ भाव में भम्रण कर रहा हो तो अधिक शुभ फल प्रदान करेगा। लेकिन कुण्डली में शुभ भाव में बैठा हो और भम्रण अशुभ भाव में कर रहा हो तो मिश्रित फल प्रदान करेगा

यदि शुक्र ग्रह कुण्डली में अशुभ भाव में बैठा होगा और अशुभ भाव में भम्रण कर रहा हो तो अधिक अशुभ फल प्रदान करेगा और शुभ भाव में भम्रण कर रहा होगा तो मिश्रित फल प्रदान करेगा।

पहले शुक्र दशा में मगंल ग्रह की अन्तर दशा होगी जो कि एक वर्ष की होगी 01-01-27 से लेकर 31-12-27 तक होगी अगर शुक्र ग्रह और मंगल ग्रह शुभ भाव में भ्रमण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे।

फिर शुक्र दशा में शुक्र का ही अन्तर दशा होगी जो कि एक वर्ष की होगी 01-01-28 से लेकर 31-12-21 तक होगी। अगर शुक्र ग्रह शुभ भाव में भम्रण करेगा तो शुभ फल प्रदान करेगा। अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेगा।

शुक्र ग्रह की दशा में बुध ग्रह की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि एक वर्ष की होगी। 01-01-29 से लेकर 31-12-29 तक होगी। अगर शुक्र ग्रह शुभ भाव में भम्रण कर रहा होगा तो शुभ फल प्रदान करेगा नहीं तो अशुभ फल प्रदान करेगा।

शुक्र ग्रह के पश्चात मंगल ग्रह की दशा आरम्भ होगी जो कि 6 वर्ष की होगी। जो 01-01-2032 से लेकर 31-12-2035 तक होगी यदि मंगल ग्रह कुण्डली में शुभ भाव में बैठा होगा और शुभ भाव भम्रण कर रहा होगा तो बहुत अधिक शुभ फल प्रदान करेगा। यदि शुभ भाव में बैठा हो और अशुभ भाव में भम्रण करे तो मिश्रित फल प्रदान करेगा और मंगल ग्रह कुण्डली में अशुभ भाव में बैठा हो अशुभ भाव में भम्रण करे तो अधिक अशुभ फल प्रदान करेगा अशुभ बैठा हो और शुभ भाव के भम्रण करेगा तो भी मिश्रित फल प्रदान करेगा।

पहले मंगल ग्रह की दशा में मंगल ग्रह की अन्तर दशा होगी जो कि 2 वर्ष की होगी। 01-01-32 से लेकर 31-12-33 तक होगी मंगल शुभ भाव में भम्रण करेगा तो शुभ फल प्रदान करेगा नहीं तो अशुभ फल प्रदान करेगा।

अब मंगल ग्रह दशा में शनि ग्रह की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि 2 वर्ष की होगी 01-01-33 से लेकर 31-12-34 तक होगी। अगर मंगल शनि ग्रह शुभ भाव में भम्रण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेंगे। अन्यथा अशुभ फल प्रदान करेंगे।

शनि दशा के अन्तर के पश्चात शुक्र ग्रह की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि दो वर्ष की होगी। 31-01-35 से लेकर 31-12-35 तक होगी। अगर मंगल शुक्र ग्रह शुभ भाव में भम्रण करेंगे। तो शुभ फल प्रदान करेंगे नहीं तो अशुभ फल प्रदान करेंगे।

मंगल ग्रह दशा के पश्चात बुध ग्रह की दशा आरम्भ होगी जो कि दो वर्ष की होगी जो कि 01-01-36 से लेकर 31-12-37 तक होगी यदि बुध ग्रह कुण्डली के शुभ भाव में बैठा हो और शुभ भाव में भम्रण करे तो अधिक शुभ फल देगा। अगर शुभ भाव में बैठा हो और अशुभ भाव में भम्रण करे तो मिश्रित फल देगा। ऐसे हो यदि अशुभ भाव में बैठा हो और अशुभ भाव में भम्रण करे तो अशुभ फल प्रदान करेगा और अशुभ भाव में बैठा हो शुभ भाव में भम्रण करे तो भी मिश्रित फल प्रदान करेगा।

पहले बुध ग्रह की दशा में चन्द्र ग्रह की अन्तर दशा होगी जो कि 01-01-36 से लेकर 01-09-36 तक होगी। अगर बुध और चन्द्र शुभ भाव में भम्रण कर रहे हैं तो शुभ फल प्रदान करेंगे नहीं तो अशुभ फल प्रदान करेंगे। उसके पश्चात बुध ग्रह दशा में मंगल ग्रह की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि 8 माह की होगी। 01-09-36 से लेकर 01-05-37 तक होगी।

बुध मंगल ग्रह शुभ भाव में भम्रण करेंगे तो शुभ फल प्रदान करेगा नहीं तो अशुभ फल प्रदान करेंगे। फिर बुध में गुरु ग्रह की अन्तर दशा आरम्भ होगी जो कि 01-5-37 से लेकर 31-12-37 तक 8 माह का सफर तय करेगी। अगर बुध गुरू ग्रह शुभ भाव में भम्रण करेंगे तो शुभ फल देंगे अन्यथा अशुभ फल देंगे। यहाँ पर 35 वर्ष का एक चक्र समाप्त हो जायेगा। उसके बाद फिर से दूसरा चक्र शुरू होगा शनि ग्रह से लेकर बुध ग्रह तक।

जो ग्रह किसी भाव में अशुभ है और वर्षफल में जिस भी भाव में भम्रण करेंगे उस भाव से सम्बन्धित फल करेंगे। भम्रण वाला भाव अगर उस ग्रह के लिए शुभ होगा तो शुभ फल प्रदान करेंगे और अशुभ होगा तो अशुभ फल प्रदान करेगा जैसे कि कोई ग्रह कुण्डली के बारहवें भाव में अशुभ बैठा है और वर्षफल में दूसरे भाव में भम्रण करता है। उसके ग्रह के लिए दूसरा भाव शुभ है तो कुछ शुभ फल करेगा। लेकिन उस ग्रह के लिए दूसरा भाव भी अशुभ होगा। तो दूसरे भाव सम्बन्धित अशुभ फल प्रदान करेगा। जैसा कि धन हानि, कुटुम्ब में परेशानी होना ।

जैसे कि ऊपर ग्रह भम्रण लिखा गया है। उसका मतलब है लाल किताब के वर्षफल फलचार्ट के अनुसार जिस भाव में बैठ गए हैं।

लाल किताब के उपाय

  1. लाल किताब से फलादेश करने की विधि
  2. जो नजर आता है वो होता नहीं
  3. लाल किताब किताब की दशाएं
  4. लाल किताब शब्दकोष
  5. लाल किताब के अनुसार पूजा कैसे करनी चाहिए ?
  6. लाल किताब के अनुसार पितृ ऋण
  7. लाल किताब के अचूक उपाय
  8. लाल किताब के अनुसार बृहस्पति का फलादेश और उपाय
  9. लाल किताब के अनुसार सूर्य का फलादेश और उपाय
  10. लाल किताब के अनुसार चंद्र का फलादेश और उपाय
  11. लाल किताब के अनुसार मंगल का फलादेश और उपाय
  12. लाल किताब के अनुसार बुध का फलादेश और उपाय
  13. लाल किताब के अनुसार शुक्र का फलादेश और उपाय
  14. लाल किताब के अनुसार शनि का फलादेश और उपाय
  15. लाल किताब के अनुसार राहू का फलादेश और उपाय
  16. लाल किताब के अनुसार केतू का फलादेश और उपाय
  17. लाल किताब के अनुसार दो ग्रहों का फलादेश और उपाय

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