अष्टकवर्ग से फलित के नियम
कुंडली में अष्टक वर्ग का फलादेश ज्योतिष विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है। अष्टक वर्ग एक ऐसी प्रणाली है जो जन्म कुंडली के विभिन्न भावों में ग्रहों की स्थिति और उनके योगदान का विश्लेषण करती है। यह प्रणाली जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ग्रहों के प्रभाव का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है।
अष्टक वर्ग का उपयोग करके फलादेश करने के लिए सबसे पहले अष्टक वर्ग तालिका बनाई जाती है। यह तालिका प्रत्येक ग्रह के आठ अलग-अलग वर्गों में विभाजित अंक प्रस्तुत करती है। ये आठ वर्ग होते हैं: लग्न, चंद्र, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, और शनि। इन आठ वर्गों के अंकों को जोड़कर कुल अंक प्राप्त किए जाते हैं, जो उस ग्रह का कुल प्रभाव दर्शाते हैं।
1. अष्टक वर्ग के कुल अंक 337 होते है और कुंडली में भाव 12 होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक भाव के 337/12 = 28 औसत अंक होते हैं।
2. प्रत्येक ग्रह प्रत्येक भाव में अधिकतम 8 अंक दे सकता है।
3. अष्टक वर्ग में शुभ भावों पर अधिक अंको का होना श्रेष्ठ माना गया है।
4. अष्टक वर्ग में 6,8,12 भाव में जितना कम अंक होंगे उतना ही अच्छा माना गया है। यहां पर अधिक अंक होने से जीवन ज्यादा कष्टकारी हो जाता है।
5. अष्टक वर्ग में 1,2,4,5,9,10,11 भावों पर 24 से कम अंक हो तो इन भावों से संबंधित फल अत्यंत कम मिलेगा ।
6. अष्टक वर्ग में जिस भाव में अधिक अंक हो उस भाव का फल जरूर मिलता है और जिसमें कम बिंदू हो उसमें फल अच्छा नहीं मिलता है।
7. कई बार कुंडली में कोई ग्रह उच्च का होकर भी फल नहीं दे पाता। इस स्थिति में अगर अष्टकवर्ग को देखा जाए तो हो सकता है कि उसके शुभ बिंदू कम है इसलिए फल नहीं मिल रहा है।
8. यदि अष्टक वर्ग में चतुर्थ भाव को 30 से ज्यादा अंक प्राप्त हो साथ में द्वितीय तथा लग्न को भी 30 से ज्यादा अंक प्राप्त हो तो इसको अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है ऐसे जातक खुद से मजबूत, सुख को भोगने वाला तथा उसको सुखों की कमी कभी नहीं रहेगी।
9. अष्टक वर्ग में यदि लग्न नवम, दशम तथा एकादश भाव को 30 से अधिक अंक प्राप्त हो तो इसको अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है ऐसे जातक हमेशा तरक्की करने वाला, इच्छा पूर्ति करने वाला तथा उसका जीवन अत्यंत सुखमय में कहा गया है।
10. यदि अष्टक वर्ग में नवम भाव को 28 से ज्यादा अंक प्राप्त हो तो ऐसे जातक का भाग्य हमेशा साथ देगा तथा इससे अधिक होने पर जातक का भाग्य हमेशा बलवान रहेगा तथा भाग्य के लिए श्रेष्ठ कहा गया है।
11. वे ग्रह जो उन भावों में स्थित हैं जिन्हें अष्टक वर्ग में अधिक अंक मिले हैं, शुभ फल करते हैं।

अष्टकवर्ग से वर-वधू का चुनाव

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1. अष्टक वर्ग का प्रयोग वर और वधू के चुनने में भी सहायक है। यदि वर की जन्म कुण्डली में जन्म राशि एक ऐसी राशि हो जिसको वधू की जन्म कुण्डली में सबसे अधिक अंक प्राप्त होते हों तो विवाह के अनन्तर सुख समृद्धि रहेगी।
इसी प्रकार यदि वधू की जन्मकुण्डली में उसकी जन्म राशि ऐसी राशि बनती हो कि उसे वर की कुण्डली में सबसे अधिक अंक अष्टक वर्ग में प्राप्त होते हैं तो भी विवाह के अनन्तर वर-वधू सुखी और समृद्ध रहेंगे ।
2. यदि अष्टक वर्ग में चंद्र राशि पर 30 से अधिक अंक हो तो जातक एक सुखी वैवाहिक जीवन जीता है और यदि उसमें 25 या 25 से कम अंक हों तो उसका वैवाहिक जीवन दुख भरा हो सकता है।
कैरियर और व्यवसाय में अष्टकवर्ग की भूमिका
1. यदि अष्टक वर्ग में दशम भाव में 36 या अधिक शुभ बिंदु हों और उस पर कोई पाप ग्रह न हो और न ही किसी पाप ग्रह से दृष्टि हो, तो जातक स्व-निर्मित (self made man) होता है।
2. यदि अष्टक वर्ग में सबसे अधिक अंक दशम भाव में है तो व्यक्ति का कैरियर स्वतः चुना जाता है।
3. दशम से अधिक बिंदू एकादश भाव में हो तो जातक को कम मेहनत से अधिक फल मिलता है।
4. यदि अष्टक वर्ग में नवम, दशम, एकादश, व लग्न भाव में 28 या इससे अधिक बिंदू हो तथा दशम भाव में कम बिंदू हो और एकादश भाव में अधिक बिंदू हो तथा व्यय भाव के बिंदूओं की संख्या कम हो तो यह अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है ऐसे जातक के पास धन हमेशा बना रहेगा, जितना करेगा उससे ज्यादा प्राप्त होगा तथा संघर्ष ज्यादा नहीं करनी पड़ेगा। जातक धनी और समृद्ध होगा।
5. यदि अष्टक वर्ग में नवम, दशम, एकादश, व लग्न भाव में 28 से कम बिंदू हो तथा व्यय भाव में लाभ भाव से अधिक बिंदू हों तो इसको अच्छा नहीं माना गया है ऐसा जातक कभी धन संचय नहीं कर पाएगा तथा उसका व्यय पर कभी नियंत्रण नहीं रहेगा। जातक दरिद्र होगा।
6. यदि अष्टक वर्ग में दशम स्थान में 28 से अधिक बिंदू हो तो जातक स्वतः अपना व्यवसाय करता है और षष्ठ स्थान में अधिक बिंदू होने पर जातक नौकरी या किसी के अधीन कार्य करता है।
7. शनि से दशम भाव में अधिक बिंदू हो तो नौकरी ऊंचे दर्जे की होती है और अगर कम बिंदू हो तो व्यापार में या नौकरी में स्थिति सामान्य होती है।
अष्टकवर्ग से गोचर फलित
1. प्रत्येक ग्रह प्रत्येक राशि में अधिकतम 8 अंक दे सकता है । यदि आठ अंकों में से चार की प्राप्ति हो तो फल मिश्रित होता है। चार से जितने कम अंक मिलेंगे फल उतना उतना अनिष्टकारी होता चला जायेगा।
2. यदि किसी राशि को कोई भी अंक न मिले तो उस राशि में गोचर आदि फल अत्यन्त अनिष्टकारी होता है।
3. चार से ऊपर पांच अंक मिलें तो फल अच्छा होता है । 6 अंक मिलें तो बहुत अच्छा, 7 अंक मिलें तो उत्तम फल और यदि आठ के आठ अंक मिल जायें, तो सर्वोत्तम फल कहना चाहिये ।
4. गोचर (transits) के समय जब कोई ग्रह उच्च अंक वाली राशि से गुजरता है, तो वह सर्वोत्तम फल देता है।
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