ग्रहों के संबंध का दशाफल पर प्रभाव

किसी ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में परिणामों की सही विवेचना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ के मध्य का संबंध ही परिणामों की दिशा तय करने का सूत्र है।

संबंधी और सधर्मी ग्रह

महादशानाथ के संदर्भ में अन्तर्दशानाथ को दो मुख्य वर्गों में रख सकते हैं – संबंधी ग्रह, असंबंधी ग्रह। इन्हें पुन: तीन वर्गों में बांटा गया है – सधर्मी, विरुद्धधर्मी, समधर्मी।

  • संबंधी ग्रह का तात्पर्य है महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ में संबंध। संबंध अर्थात् यदि चतुर्विध संबंध में से कोई भी एक संबंध महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ के मध्य हो तो उन्हें संबंधी कहा जाएगा।
  • यदि महादशा नाथ और अन्तर्दशानाथ में चतुर्विध संबंधों में से कोई भी संबंध नहीं बनता हो तो उन्हें असंबंधी ग्रह माना जाएगा।
  • सधर्म का तात्त्पर्य है समान धर्म या स्वभाव वाला। यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ दोनों शुभ भावों के स्वामी हों अथवा अशुभ भावों के स्वामी हों तो इन्हें सधर्मी ग्रह कहा जाएगा।
  • स्पष्ट है कि अधर्मी ग्रह का तात्पर्य है दोनों में समानता न हो, एक शुभ हो, एक अशुभ।

5. समधर्मी ग्रह का तात्पर्य है कि ग्रह परस्पर न सधर्मी हो, न विरोधी हो।

ग्रहों के संबंध का दशाफल पर प्रभाव

जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ संबंधी ग्रह होंगे तब परिणामों की तीव्रता सर्वाधिक होगी, चाहे वे शुभ हों अथवा अशुभ।

यह विदित है कि किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा परिणाम देने में सक्षम नहीं होती चाहे महादशानाथ कारक हो अथवा मारक। यदि महादशानाथ कारक ग्रह हैं तो सर्वश्रेष्ठ परिणाम तब मिलेंगे, जब कारक ग्रह की अन्तर्दशा आएगी। यही नियम मारक ग्रह पर भी लागू होता है।

यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ विरुद्धधर्मी हों अर्थात् एक शुभ एक अशुभ तो मिश्रित परिणाम आएंगे और परिणामों की तीव्रता सीमित हो जाएगी।

इन नियमों को हम और अधिक विस्तार से विभिन्न भावेशों के आधार पर समझने का प्रयास करते हैं।

1. केन्द्रेश व त्रिकोणेश : केन्द्रेश व त्रिकोणेश सधर्मी ग्रह हैं क्योंकि दोनों शुभ भावों के स्वामी हैं अत: एक की महादशा में दूसरे की अन्तर्दशा शुभफल देगी। यदि इन दोनों के बीच किसी भी प्रकार का परस्पर संबंध हो तो फल विशेष शुभ हो जाएगा।

इस संबंध में अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है, वह यह है कि यदि केन्द्रेश या त्रिकोणेश अशुभ भाव के स्वामी भी हों तो शुभफल तब प्राप्त होंगे जब इन दोनों में किसी प्रकार का संबंध हो और अशुभ फल तब प्राप्त होंगे यदि इनमें किसी प्रकार का संबंध न हो।

अधिक स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि सहधर्मी होते हुए भी यदि किसी प्रकार का दोष हो तो शुभफल उसी स्थिति में मिलेंगे, जब ये संबंधी भी हों।

यहाँ यह उल्लेख करना अत्यंत आवश्यक है कि दोष का तात्पर्य अशुभ भाव का स्वामी होने से ही है, ग्रह के नीच या अस्त आदि होने को यहॉ दोष नहीं माना गया है।।

2. योगकारक व मारक : किसी योगकारक ग्रह की महादशा में शुभ परिणाम तब प्राप्त होंगे जब किसी अन्य योगकारक की अन्तर्दशा आएगी अर्थात् सहधर्मी की। यदि दोनों में संबंध भी हुआ तो परिणाम की तीव्रता बढ़ जाएगी अर्थात् सहधर्मी होने के साथ-साथ संबंधी भी हुए तो विशेष परिणाम प्राप्त होंगे। संबंध न होने की स्थिति में सामान्य फल ही मिलेंगे।

यदि योगकारक ग्रह की महादशा में मारक ग्रह की अन्तर्दशा हो, दोनों में संबंध भी हो रहा हो तो राजयोग की प्राप्ति हो सकती है (यद्यपि यह स्थायी नहीं होगा) स्पष्ट है कि संबंधी होने से परिणाम प्राप्त होंगे।

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यही नियम मारक ग्रह की महादशा में लागू होगा। मारक ग्रह की महादशा में सर्वाधिक मारक परिणाम तब आएंगे जब मारक ग्रह की अन्तर्दशा आएगी और दोनों में संबंध भी होगा।

मारक ग्रह की महादशा में संबंधी पापग्रह की अन्तर्दशा में अशुभ परिणाम की तीव्रता कम होगी क्योंकि यह सहधर्मी नहीं होकर सिर्फ संबंधी हैं।

यह उल्लेख आवश्यक है कि चतुर्विध संबंध के अतिरिक्त एक-दूसरे से केन्द्र-त्रिकोण में होना भी संबंध है

ग्रहों के संबंध का दशाफल पर प्रभाव, graho ke sambhand ka dashaphal par prabhaav

3. पाप ग्रह की दशा : पाप ग्रह की महादशा में असंबंधी शुभ ग्रह की अन्तर्दंशा हो तो परिणाम अशुभ होते हैं।

यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 2,3,11 भावेशों की दशा सामान्य फल देती है और 6,8,12 भावेशों की दशा कष्ट देने वाली होती है। पापी महादशेश में संबंधी शुभग्रह की अन्तर्दशा मिश्रित फल देगी।

स्पष्ट है कि महादशेश एवं अन्तरर्दशेश में संबंध होने पर परिणामों की तीव्रता बढ़ती है।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। महादशेश एक राजा के समान है और अन्तर्दशेश उस राजा के अधीन अधिकारी। पापी राजा के राज में सज्जन अधिकारी चाहते हुए भी अच्छा कार्य नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में यदि अधिकारी अत्यधिक सज्जन हुआ तो और भी अधिक डरेगा इसीलिए पापी महादशेश में असंबंधी योगकारक की अन्तर्दशा में अशुभ परिणाम मिलेंगे।

यदि राजा और अधिकारी में किसी भी प्रकार की रिश्तेदारी या संबंध हो तो अधिकारी कभी-कभी निर्भय होकर अपनी इच्छानुसार कार्य कर लेगा अत: संबंधी होने की स्थिति में पापी महादशेश में शुभ अथवा योगकारक अन्तर्दशेश मिश्रित फल देंगे।

यही नियम शुभ महादशेश में अशुभ या अयोगकारक अन्तर्दशेश पर लागू होगा। इसी उदाहरण से यह भी समझा जा सकता है कि पापी ग्रह की महादशा में पापी ग्रह की अन्तर्दशा बहुत अशुभ परिणाम देगी और यदि इनमें संबंध भी हो तो ‘करेला और नीम चढ़ा’ की कहावत पूर्णत: चरितार्थ होगी।

4. राहु-केतु की दशा के नियम : राहु-केतु के लिए नियम है कि ये जिस भाव में बैठते हैं और जिस भावेश से संबंध करते हैं उसी के समान परिणाम देते हैं। केन्द्र-त्रिकोण में बैठने मात्र से राहु-केतु अपनी दशा में शुभफल देंगे।

यदि ये केन्द्र-त्रिकोण में बैठकर केन्द्रेश या त्रिकोणेश से संबंध भी करें तो अपनी दशा में योगकारक के समान फल देते हैं।

अब याद रखने योग्य बिन्दु यह है कि केन्द्र में शुभ राशि में बैठने पर इन्हें भी केन्द्राधिपति दोष लगेगा। केन्द्र में पाप राशि में बैठने पर अशुभता सम हो जाएगी और राहु-केतु अपनी दशा में सामान्य फल देंगे।

केन्द्र त्रिकोण में स्थित राहु-केतु यदि केन्द्रेश-त्रिकोणेश से संबंध न भी करें तो भी केन्द्रेश-त्रिकोणेश की महादशा में इनकी दशा शुभ परिणाम देगी क्योंकि केन्द्र-त्रिकोण में बैठने से वे केन्द्रेश-त्रिकोणेश के समान फल देंगे अत: ऐसी दशा में सहधर्मी होने से शुभ परिणाम प्राप्त होंगे।


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