गुरु चांडाल योग

ज्योतिष में यह एक अशुभ योग माना जाता है, जो बृहस्पति (गुरु) और राहु के एक ही भाव में स्थित होने या आपस में दृष्टि सम्बंध बनाने से बनता है। अनुभव में ऐसा देखा गया है कि गुरु-राहु या गुरु केतु जिस भाव में भी होते है उस भाव को साधारण कोटि का बना देते है । यह योग व्यक्ति के जीवन में कई तरह की परेशानियां और नकारात्मक प्रभाव ला सकता है। 

इस योग का दुष्प्रभाव बहुत अधिक बढ जाता है अगर राहु और गुरु पर अन्य पाप प्रभाव भी हो या राहु, गुरु की राशि (धनु, मीन) में हो ।

गुरु चांडाल योग के संभावित नुकसान

गुरु चांडाल योग के मुख्य नुकसान इस प्रकार हैं:

चरित्र दोष:  यह योग व्यक्ति के चरित्र को कमजोर कर सकता है, जिससे वह गलत आदतों और बुरे कामों में लिप्त हो सकता है। 

मानसिक समस्याएं:  यह योग मानसिक अशांति, भ्रम, और निर्णय लेने में कठिनाई का कारण बन सकता है। 

आर्थिक समस्याएं:  यह योग धन की हानि, अनावश्यक खर्च, और आर्थिक तंगी का कारण बन सकता है। 

पारिवारिक समस्याएं:  यह योग पारिवारिक कलह, अशांति, और वैवाहिक जीवन में समस्याओं का कारण बन सकता है। 

शिक्षा और करियर में बाधाएं:  यह योग शिक्षा में बाधाएं उत्पन्न कर सकता है और करियर में सफलता प्राप्त करने में मुश्किल हो सकती है। 

मान-सम्मान में कमी:  यह योग व्यक्ति के मान-सम्मान को कम कर सकता है और उसे समाज में अपमानित कर सकता है। 

गुरु चांडाल योग शांति के उपाय

गुरु चांडाल योग के नकारात्मक प्रभावों से बचने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं: 

गुरु और राहु की पूजा:  बृहस्पति और राहु की पूजा, मंत्र जाप, और दान-पुण्य करना फायदेमंद हो सकता है। 

गुरुजनों का सम्मान:  गुरुजनों और बड़ों का सम्मान करना और उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। 

सच्चरित्रता: गलत आदतों और बुरी संगति से बचना चाहिए। 

धार्मिक कार्यों में संलग्नता:  धार्मिक कार्यों में संलग्न रहने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से भी लाभ हो सकता है। 

शकट योग

परिभाषा – चन्द्रमा से छठे या आठवें भाव में गुरु हो तथा कुण्डली में लग्न से केन्द्र स्थान में गुरु न हो तो ऐसी स्थिति में शकट योग बनता है ।

फल – शकट योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति भाग्यहीन होता है तथा उसे जीवन में कितने ही उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं । ऐसा व्यक्ति अप्रसिद्ध और साधारण स्तर का होता है । कर्ज के भार घृणा से जीवनभर दबा रहता है तथा सगे-सम्बन्धी भी उसके कार्यों से करते हैं ।

टिप्पणी – शकट योग के बारे में विद्वानों में मतभेद है । मानसागरी के मतानुसार – “जिसकी कुण्डली में लग्न और सप्तम स्थान में सूर्यादि सभी ग्रह स्थित हों तो शकट योग होता है ।“ इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक गाड़ी चलाने (ठेला चलाने) वाला होता है ।

मैंने अपने जीवन में हजारों जन्म पत्रिकाओं का अध्ययन किया है। कुछ ऐसी कुण्डलियाँ भी दृष्टि से निकली हैं, जिनमें मानसागरी में वर्णित उपर्युक्त योग विद्यमान था, परन्तु वे जातक जीवन में सुखी, ऐश्वर्यवान एवं आनन्दपूर्ण जीवन बिताने वाले रहे, अतः व्यावहारिक रूप से मानसागरी वर्णित शकट योग सही नहीं उतरता है ।

मैंने जो ऊपर ‘शकट योग’ का लक्षण दिया है, अधिकतर विद्वान वही मानते हैं और व्यावहारिक रूप में भी ऐसा योग रखने वाले जातक जीवन में असफल तथा असन्तुष्ट रहते हैं ।

मूल संस्कृत में ‘षष्ठाटमगतश्चन्द्रा’ पाठ है, जिससे तात्पर्य है चन्द्रमा से 6 या 8वें स्थान में गुरु हो, परन्तु यदि गुरु, चन्द्रमा से 12वें भाव में हो तो भी शकट योग बनता है ।

इस प्रकार चन्द्रमा से 6, 8 या 12वें भाव में गुरु हो तथा लग्न से केन्द्र में गुरु न पड़ा हो तो शकट भी योग बनता है, ऐसा समझना चाहिए ।

गजकेशरी योग

परिभाषा – चन्द्रमा से केन्द्र में (1, 4, 7, 10) वें भाव बृहस्पति स्थित हो तो गजकेशरी योग होता है। यदि शुक्र या बुध नीच राशि में स्थित न होकर या अस्त न होकर चन्द्रमा को सम्पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो प्रबल गजकेशरी योग होता है।

फल – इस योग में जन्म लेने वाला जातक अनेक मित्रों, प्रशंसकों एवं संबंधियों से घिरा रहता है एवं उनके द्वारा सराहा भी जाता है । स्वभाव से नम्र, विवेकवान तथा सद्गुणी होता है ।

इस प्रकार का योग रखने वाला जातक जीवन में उन्नति करता है । कृषि कार्यों से उसे विशेष लाभ होता है या वह नगरपालिकाध्यक्ष या मेयर बन जाता है। तेजस्वी, मेधावी, गुणज्ञ तथा राज्यपक्ष में प्रबल उन्नति करने वाला होता है ।

स्पष्टतः गजकेशरी योग रखने वाला जातक जीवन में उच्च स्थिति प्राप्त कर पूर्ण सुख भोगता है तथा मृत्यु के बाद भी उसकी यश-गाथा अक्षुण्ण रहती है।



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