कुंड्ली में शिक्षा के योग

शिक्षा व ज्योतिष का भी परस्पर विशेष संबंध है। जब हम किसी व्यक्ति की शिक्षा के संबंध में ज्योतिषीय अध्ययन करते हैं तो कुण्डली के लग्न, द्वितीय, चतुर्थ तथा पंचम्‌ भावों के कारक ग्रह सूर्य, बुध, चन्द्रमा और बृहस्पति एवं शुक्र की पारस्परिक स्थिति को देखते हैं।

शिक्षा में लग्न का महत्व

लग्न जन्मपत्री में स्वास्थ्य और व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। लग्न यदि बलवान न हो तो व्यक्ति कार्य करने में असमर्थ रह जाता है। सामान्य तौर पर भी कहावत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन वास करता है। शिक्षा के स्तर व शिक्षा की दिशा जानने के लिए हमें लग्न एवं लग्नेश के बली होने पर विचार करना होता है।

लग्न व लग्नेश बली होते हैं तो ऐसा व्यक्ति कठोर श्रम करने वाला, लगनशील एवं सुरुचि सम्पन्न होता है। आलस्यादि को त्यागकर ज्ञानार्जन के लिए गंभीर, सजग व सावधान बना रहता है।

इसके विरुद्ध कमज़ोर एवं रुग्ण तथा निराश व्यक्तित्व का व्यक्ति किसी भी कार्य को अधूरा छोड़, बीच में ही कार्य से विमुख हो हार मान लेता है।

शिक्षा में द्वितीय भाव का महत्व

द्वितीय भाव वाणी तथा पंचम्‌ भाव ज्ञान एवं बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है। यदि पंचम्‌ भाव बली हो और द्वितीय भाव निर्बल हो तो व्यक्ति उत्तम शिक्षा प्राप्त करके भी वाणी एवं अभिव्यक्ति के अभाव में अर्जित ज्ञान को अभिव्यक्त करने में असमर्थ रहता है, अर्थात्‌ द्वितीय भाव का पंचम भाव के साथ बली होना आवश्यक होता है ।

अभिव्यक्ति एवं वाणी के साथ ही साथ द्वितीय भाव कुटुम्ब का भाव भी होता है। द्वितीय भाव की सुदृढ़ता एवं बली होना उसके श्रेष्ठ परिवार का द्योतक होता है। श्रेष्ठ से मतलब शिक्षित, सम्पन्न एवं संस्कारवान परिवार होता है।

किसी व्यक्ति के शैक्षणिक स्तर के लिए द्वितीय एवं पंचम्‌ भाव के अलावा कुछ अन्य स्थितियों पर भी विचार करना आवश्यक होता है।

  • देशकाल व वातावरण कैसा है।
  • धार्मिक वातावरण एवं धार्मिक सहिष्णुता किस प्रकार की है।
  • युग प्रवृत्ति कैसी है।  
  • व्यक्ति का आयु वर्ग क्‍या है।

द्वितीय भाव में विभिन्न राशियों का फल

यदि द्वितीय भाव में

1. मेष राशि होने पर व्यक्ति मेहनती, सम्पन्न, निष्ठावान एवं विकासशील होता है।

2. वृष राशि होने पर व्यक्ति कृषि क्षेत्रों एवं पशुपालन विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करता है।

3. मिथुन राशि होने पर व्यक्ति अन्वेषक प्रवृत्ति का होता है तथा रसशास्त्र व रसायन तथा सौन्दर्य प्रसाधन एवं ललित कलाओं के क्षेत्र में शिक्षा प्रात करने की इच्छा रखता है।

4. कर्क राशि होने पर वाणिज्य, व्यापार, व्यवसाय, प्रशासन, ई-कॉमर्स, लेखा, आयात, निर्यात के क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करता है।

5. सिंह राशि होने पर व्यक्ति दर्शन और दर्शनशास्त्र का अध्ययन पसन्द करता है।

6. कन्या राशि होने पर व्यक्ति राजा या राज्याधिकारी का सान्निध्य प्राप्त करता है। तर्क एवं कूटनीति के क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त कर अग्रण रहता है।

7. तुला राशि होने पर व्यक्ति मैकेनिकल एवं काँच उद्योग की शिक्षा या प्रशिक्षण प्राप्त करता है।

8. वृश्चिक राशि होने पर व्यक्ति कला विषयों में शिक्षा प्राप्त कर वक्ता बन जाता है तथा सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यो का नेतृत्व करता है।

9. धनु राशि होने पर व्यक्ति सेना से जुड़ी इंजीनियरिंग और आयुध निर्माण आदि के क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करते हैं ।

10. मकर राशि होने पर व्यक्ति समुद्री व्यापार, नौकायन, जहाज, विदेशी व्यापार संबंधी ज्ञान या प्रशिक्षण प्राप्त कर आजीविका कमाता है।

11. कुंभ राशि होने पर व्यक्ति बाँधों, पुलों, भवनों के निर्माण से संबंधित इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करता है।

12. मीन राशि होने पर व्यक्ति का मानसिक स्तर उच्च श्रेणी का होता है। ऐसा व्यक्ति दर्शन, कला, साहित्य, धार्मिक शिक्षा आदि में गहन रुचि रखता है।

द्वितीय भाव में विभिन्न ग्रहों का फल

1. सूर्य के द्वितीय भाव स्थित होने पर व्यक्ति शैक्षणिक कैरिअर में भटक जाता है तथा भ्रमित हो जाता है। अतः शिक्षा धीमी गति से प्राप्त करता है।

2. चन्द्रमा के द्वितीय भाव में स्थित होने से व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति कानून और समाज विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करता है। चन्द्रमा क्षीण होने पर व्यक्ति बातूनी होता है।

3. द्वितीय भाव में मंगल स्थित होने पर व्यक्ति कृषि या धातु विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करता है, जबकि अशुभ स्थिति होने पर व्यक्ति अल्पबुद्धि, अल्पभाषी, कटुवाणी तथा शिक्षा को बीच में छोड़ देने वाला होता है।

4. बुध के द्वितीय भाव में स्थित होने पर व्यक्ति बुद्धिमान, वाक्‌चतुर एवं मधुरभाषी होता है तथा शिक्षा में उच्च सफलताएँ प्राप्त करता है।

5. बृहस्पति के द्वितीय भाव में होने पर व्यक्ति शिक्षा में अग्रणी होता है तथा वह कुशल वक्ता, उपदेशक, व्याख्याता तथा मधुरभाषी होता है।

6. शुक्र के द्वितीय भाव में स्थित होने पर व्यक्ति बहुक्षेत्री, बहुविज्ञ एवं जन्मजात विद्वान होता है तथा थोड़े से समय में ही सफलता अर्जित करता है।

7. शनि द्वितीय भाव में स्थित होने पर व्यक्ति शिक्षा में कमजोर, अल्पविद्या, असत्य वक्ता, कटुभाषी होता है।

8. राहु के द्वितीय भाव में स्थित होने पर व्यक्ति कुसंगति में पड़कर कुशिक्षा ग्रहण करता है तथा षड़्यंत्रों एवं कूटनीति में रुचि लेता है।

द्वितीयेश का विभिन्न भावों में फल

जिस प्रकार द्वितीय भाव में स्थित राशियों से व्यक्ति की शिक्षा के क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है, उसी प्रकार द्वितीय भाव के स्वामी के विभिन्न भावों में स्थित होने से शिक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों को जाना जाता है ।

1. द्वितीयेश के लग्नस्थ होने पर व्यक्ति धन संबंधी संस्थाओं तथा बैंकिंग व वित्तीय संस्थान, व्यापार, वाणिज्य के क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करता है।

2. द्वितीयेश के द्वितीय भावस्थ होने पर व्यक्ति उच्च शिक्षा को ओर आकृष्ट होता है, जबकि तृतीय एवं चतुर्थ भाव में द्वितीयेश के स्थित होने पर जातक का मानसिक स्तर उच्च श्रेणी का होता है । वह अन्वेषण संबंधी कार्य करता है।

3. द्वितीयेश के 6-8-12वें भाव में स्थित होने पर व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में पिछिड़ जाता है तथा बीच में ही अध्ययन छोड देता है अथवा क्षेत्र में परिवर्तन करता है।

4. द्वितीयेश के 9 या 11वें भाव में स्थित होने पर व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय उन्नति एवं सफलता प्राप्त करता है।

5. द्वितीयेश के द्वादश भाव में स्थित होने पर व्यक्ति मंदबुद्धि, विवेकशून्य तथा शिक्षा प्राप्त करने में असमर्थ रहता है।

शिक्षा में चतुर्थ भाव का महत्व

चतुर्थ भाव भावनाओं, मानसिक प्रवृत्तियों, मन एवं मन के कारक चन्द्रमा का होता है। कहावत भी है कि मन बली तो जग बली, अर्थात्‌ मानसिक रूप से दृढ़ व्यक्ति लक्ष्य को प्राप्त करके ही छोड़ता है।

चतुर्थ भाव बली तो चन्द्रमा बली, अर्थात्‌ सुदृढ़ मानसिकता कर्म क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम देती है। चतुर्थ भाव के कमज़ोर होने अर्थात्‌ कमजोर चन्द्रमा के प्रभाव से व्यक्ति के मन में निराशा आ जाती है। इससे वह बारम्बार निर्णय बदलता है और लक्ष्य से भटक जाता है। शिक्षा ज्ञान का प्रत्यक्ष रूप है अत: ज्ञान प्राप्ति के लिए बली चन्द्र का होना आवश्यक है।

शिक्षा में पंचम भाव का महत्व

पंचम्‌ भाव ज्ञान, बुद्धि एवं बौद्धिक स्तर, पूर्व जन्मों में किए कर्मों के फल, प्रेम आदि का भाव होता है। उच्चतर शिक्षा प्राप्ति के लिए पंचम्‌ भाव, पंचमेश एवं पंचम भाव के नैसर्गिक कारक बृहस्पति की शुभता पर विचार करना होगा।

पंचम भाव में विभिन्न राशियों का फल

1. पंचम्‌ भाव में मेष राशि होती है तो व्यक्ति प्रखर बुद्धि का होता है, परन्तु उसकी प्रवृत्ति हिंसक होती है, गणित व सांख्यिकी में निपुण होता है।

2. पंचम्‌ भाव में वृष राशि होने पर व्यक्ति चंचल मन होता है। शिक्षा के प्रति गंभीर तथा काव्यप्रिय होता है । व्यक्तित्व विनग्र एवं आकर्षक होता है। शिक्षा में सफल होता है।

3. पंचम्‌ भाव में मिथुन राशि होने पर व्यक्ति साधारण शिक्षा प्राप्त करता है।

4. पंचम्‌ भाव में कर्क राशि होने पर व्यक्ति की समझ शक्ति तीव्र एवं प्रखर होती है। चंचल प्रवृत्ति के कारण शिक्षा से विमुख करता है।

5. पंचम्‌ भाव में सिंह राशि पर व्यक्ति कानून, चिकित्सा एवं धार्मिक विषयों की शिक्षा प्राप्त करता है।

6. पंचम्‌ भाव में कन्या राशि होने पर व्यक्ति की विचार शक्ति बढ़ जाती है।

7. पंचम्‌ भाव में तुला राशि होने पर व्यक्ति का मधुर एवं मित्रवत्‌ व्यवहार उसे शिक्षा में उन्नति दिलाता है।

6. पंचम्‌ भाव में वृश्चिक राशि होने पर व्यक्ति राजनेता अथवा सेना संबंधी शिक्षा प्राप्त करता है।

7. पंचम्‌ भाव में धनु राशि होने पर व्यक्ति दर्शन, अर्थशास्त्र, सेना संबंधी शिक्षा प्राप्त करता है।

8. पंचम्‌ भाव में मकर राशि होने पर व्यक्ति न्‍्यायप्रिय होता है तथा सत्यभाषी एवं विवेक से उत्तम शिक्षा प्राप्त करता है।

9. पंचम्‌ भाव में कुंभ राशि होने पर व्यक्ति अस्थिर एवं अनियंत्रित मस्तिष्क का होता है। ऐसे व्यक्ति की जादू, रहस्य विद्या, रसायन शास्त्र एवं सौन्दर्य में रुचि होती है।

10. पंचम्‌ भाव में मीन राशि होने पर व्यक्ति श्रेष्ठ विद्वान होता है तथा उसके ज्ञान की पराकाष्ठा होती है। शिक्षा में अद्वितीय स्थान प्राप्त करता है।

पंचम भाव में विभिन्न ग्रहों का फल

1. सूर्य स्थित होने पर व्यक्ति आलसी, लापरवाह, धीमा एवं पिछड़ा बन जाता है, परन्तु उसकी पर्यटन, धातुविज्ञान एवं नीतिशास्त्र में अभिरुचि होती है।

2. चन्द्र स्थित होने पर व्यक्ति निष्ठावान, बुद्धिमान, समझदार होता है तथा उसकी रहस्यपूर्ण विधाओं में रुचि रहती है। शिक्षा में व्यवधान आता है।

3. मंगल स्थित होने पर व्यक्ति मंदबुद्धि या अल्पबुद्धि होता है, ऐसा व्यक्ति हस्तकला एवं लघु उद्योग में शिक्षा प्राप्त करता है।

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4. बुध के स्थित होने पर व्यक्ति बहुविध सफलताएँ प्राप्त करता है। वह साहित्य, ललित कला, चिकित्सा, उपदेश, दर्शन व प्रशासन संबंधी शिक्षा प्राप्त करता है।

5. बृहस्पति स्थित होने पर व्यक्ति सुलझे एवं परिपक्व विचारों का होता है। ऐसा व्यक्ति जिस क्षेत्र को चुने उसी में सफलता हासिल करता है।

6. शुक्र होने पर व्यक्ति सेनानायक होता है तथा काव्य एवं सौन्दर्य कलाओं में रुचि रखता है।

7. शनि होने पर व्यक्ति आलसी एवं लापरवाह होता है। अत: शिक्षा में पिछड़ जाता है। ऐसे व्यक्ति को शिक्षा की अपेक्षा कृषि एवं ठेकेदारी संबंधी व्यवसाय में अपना भविष्य स्थापित करना चाहिए।

8. राहु पंचमस्थ होने पर व्यक्ति मानसिक भ्रम, कायरता का शिकार हो जाता है। शिक्षा ग्रहण भी नहीं कर पाता है। रहस्य एवं गलत विधाओं में अभिरुचि रहती है।

पंचमेश के विभिन्न भावों में स्थित होने का फल

1. पंचमेश के लग्न या तृतीय भाव में स्थित होने पर व्यक्ति रसायन, अर्थशास्त्र तथा रहस्यपूर्ण विधाओं में शिक्षा प्राप्त करता है।

2. पंचमेश के 6-8-12 भावों में स्थित होने पर व्यक्ति भ्रमित हो जाता है तथा शिक्षा के क्षेत्र में कई बाधाएँ होती हैं ।

3. पंचमेश के 9-5-10-11 भावों में होने पर व्यक्ति परिपक्व मस्तिष्क का होता है। शिक्षा के क्षेत्र में, लेखन, पत्रकारिता आदि विषय चुन लेता है।

4. पंचमेश के 2 व 5 वें भाव में होने पर व्यक्ति सामान्य बुद्धि का होता है तथा शिक्षा प्राप्ति में भी सामान्य होता है।

5. पंचमेश के 7 वें भाव में होने पर व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी एवं संस्कारवान होता है।

अन्य शैक्षणिक योग

1. यदि द्वितीयेश केन्द्र अथवा त्रिकोण में, शुभ राशियों में स्थित होकर बृहस्पति से युत हो तो व्यक्ति शिक्षा में श्रेष्ठ उन्नति कर सफलता प्राप्त करता है।

2. द्वितीय भाव में सूर्य एवं मांदि के स्थित होने पर व्यक्ति अल्पबुद्धि/मंदबुद्धि का होता है।

3. यदि पंचमेश केन्द्र या त्रिकोण में शुभ राशि एवं शुभ ग्रहों व गुरु से युत हो तो शिक्षा में सफलता अवश्य मिलती है।

4. यदि पंचमेश, नवमेश से युक्त कर पंचम्‌ भाव में बैठा हो तो शिक्षा के क्षेत्र में प्रबल सफलताएँ मिलती हैं।

5. चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र के पंचम्‌ भाव में स्थित होने पर जातक तीव्र बुद्धि और विशद्‌ ज्ञान का स्वामी होता है।

6. मंगल की पंचम भाव अथवा पंचमेश पर दृष्टि पढ़ने की शक्ति को बढ़ाती है, कम नहीं करती, क्योंकि मंगल एक ऊहापोह (Logic) प्रिय ग्रह है।

7. शनि काला होने से अंधेरा पसन्द करता है। अतः यह ग्रह शिक्षा (Education) नहीं चाहता। जब इसकी दृष्टि पंचम भाव, पंचमेश, द्वितीय भाव, द्वितीयेश अथवा बुध पर हो तो अल्पशिक्षा तथा विघ्नयुक्त शिक्षा कहनी चाहिए।

शिक्षा के कारक ग्रह

बुध (Mercury): बुद्धि, तर्क, संचार, गणित और विश्लेषण का मुख्य कारक है। यह सीखने की क्षमता (बुद्धिमत्ता) प्रदान करता है।

बृहस्पति (Jupiter): उच्च शिक्षा, ज्ञान, दर्शन, आध्यात्मिकता और विस्तार का कारक है। यह ज्ञान प्रदान करता है।

चंद्रमा (Moon): मन, भावना और एकाग्रता को नियंत्रित करता है। पढ़ाई में मन लगाने और मानसिक स्थिरता के लिए चंद्रमा महत्वपूर्ण है। यदि अशुभ हो तो मन भटकता है।

सूर्य (Sun): आत्मविश्वास, पहचान और ऊर्जा का प्रतीक है, जो शिक्षा में सफलता के लिए आवश्यक है।

मंगल (Mars): ऊर्जा, साहस और व्यावहारिक कौशल देता है। इंजीनियरिंग और रिसर्च जैसे क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।

शनि (Saturn): अनुशासन, दृढ़ता और तकनीकी शिक्षा (इंजीनियरिंग, कानून) के लिए जिम्मेदार है।

शुक्र (Venus): कला, कल्पना, रचनात्मकता का कारक है।

राहु-केतु (Rahu-Ketu): राहु नई और तकनीकी शिक्षाओं में, जबकि केतु गूढ़ और आध्यात्मिक ज्ञान में रुचि जगाते हैं। राहु कभी-कभी भ्रमित करता है (पंचम भाव में), लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं (षष्ठम भाव में) में सफलता दिला सकता है।

कुंड्ली में डॉक्टरी शिक्षा के योग

सूर्य स्वास्थ्य का कारक माना गया है। मंगल भुजबल, उत्साह व कार्य शक्ति का कारक है। गुरू ज्ञान और सुख का। इसलिए यदि जन्म कुंडली में सूर्य, मंगल व गुरू बली हों, तो व्यक्ति कुशल चिकित्सक बनता है।

डॉक्टर बनने के लिए जन्म कुंडली में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, चंद्रमा जैसे ग्रहों की मजबूत स्थिति और 6वें (रोग), 10वें (व्यवसाय) और 11वें (लाभ) भावों का संबंध महत्वपूर्ण होता है, जो चिकित्सा ज्ञान, सेवाभाव, साहस और सफलता के लिए जरूरी है, जिसमें सूर्य दवा और मंगल सर्जरी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि चंद्रमा मन की मजबूती और बृहस्पति उच्च शिक्षा व विशेषज्ञता देते हैं।

  • सूर्य: दवा, डॉक्टर और आत्मा का कारक ग्रह है; मजबूत स्थिति आवश्यक है।
  • मंगल: सर्जरी, ऑपरेशन और साहस से जुड़ा है; 6वें या 10वें भाव में बलवान होना चाहिए।
  • बृहस्पति: ज्ञान, उच्च शिक्षा और विशेषज्ञता के लिए महत्वपूर्ण है।
  • चंद्रमा: मन की मजबूती और सेवाभाव देता है; पेडियाट्रिक्स (बच्चों के डॉक्टर) के लिए विशेष है।
  • 6वां भाव: रोग, स्वास्थ्य और सेवा का भाव है; इस भाव का स्वामी मजबूत होना चाहिए।

मंगल ग्रह रक्त के साथ साहस, हिम्मत का, हौसले का कारक ग्रह है। जब जन्म कुण्डली में मंगल शुभ एवं बलवान स्थिति में हो, तब जातक को मरीज का खून देखकर घबराहट नहीं होती और उसमें बर्दाश्त करने की प्रबल शक्ति होती है, इसलिए एक सर्जन बनने के लिए मंगल की स्थिति भी अच्छी होनी चाहिए या मंगल अच्छे ग्रहों के प्रभाव में होना चाहिए। प्रसिद्ध मेडिकल सर्जनों की जन्म कुण्डली में मंगल अति बलवान देखा गया है

एम0बी0बी0एस0 कर डॉक्टर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त विभिन्न क्षेत्रों में स्पेशलाइजेशन हासिल करने के लिए गुरु ग्रह का बलवान होना भी अति आवश्यक है। बलवान गुरु मेडिकल के क्षेत्र में अन्य ग्रह स्थिति सहायक होने पर ज्ञान के साथ डॉक्टर के हाथ में यश प्रदान करता है

कुंड्ली में इंजीनिरिंग शिक्षा के योग  

वैदिक ज्योतिष में मंगल और शनि को इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है। यह तो सभी जानते हैं कि शनि को लौह से जुड़े पदार्थों, मशीनों, औजारों, उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि का प्रतिनिधि ग्रह माना जाता है। वहीं मंगल विद्युत का कारक है। ऐसे में देखा जाए तो ये दोनों ग्रह इंजीनियरिंग और तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यदि कुंडली में शनि और मंगल मजबूत ना हों तो इंजीनियरिंग के क्षेत्र में बाधा का काम करते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति कितनी भी मेहनत कर ले, उसे सफलता नहीं मिलती।

ज्योतिषशास्त्र में सूर्य, मंगल, शनि व राहु-केतु को पाप ग्रह माना है, किंतु पंचम भाव या पंचमेश से संबंध करने पर ये ग्रह जातक की तकनीकी क्षमता बढ़ा देते हैं।

दशम भाव या दशमेश से मंगल, शनि, राहु-केतु का संबंध होने पर जातक को तकनीकी क्षेत्र में आजीविका मिलती है। अर्थात वह इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सफल होता है।

वकील या न्यायाधीश बनने के योग

नवम भाव द्वारा धर्म, नीति-नियम व न्याय प्रियता का तथा षष्ठ भाव से कोर्ट कचहरी संबंधी विवादों का विचार किया जाता है। दशमेश का नवम या षष्ठ भाव से संबंध होने पर व्यक्ति वकील बनता है।

दंड का कारक शनि, यदि दशम भाव में उच्चस्थ हो अथवा गुरू उच्चस्थ या स्वक्षेत्री होकर, दशम भाव या दशमेश से दृष्टि-युति संबंध करें, तो जातक वकील या जज बनता है।

सेना या पुलिस अधिकारी बनने के योग

मंगल को बल, पराक्रम व साहस का प्रतीक माना है। कुंडली में मंगल बली होने पर जातक को सेना या पुलिस में करियर प्राप्त कराता है। दशमेश या दशमेश का नियंत्रक मंगल जातक को सेना या पुलिस में आजीविका दिलाता है। दशम भाव में उच्च का मंगल या सप्तम भाव में स्वराशि का मंगल सेना यॉ पुलिस विभाग में उच्च पद दिलाता है।

सीए बनने के योग

बुध का संबंध व्यापारिक खातों से तथा गुरू का संबंध उच्च शिक्षा, परामर्श एवं मंत्रणा से है। बुध व गुरू का बली होकर दशम भाव से संबंध करना जातक को लेखाकर (सीए) बनाता है। द्वितीय भाव का संबंध वित्त व वित्तीय प्रबंध से है। बुध का संबंध द्वितीय, पंचम अथवा दशम भाव से हो तो चार्टर्ड एकाउंटेंट बनाता है।

बैंक अधिकारी बनने के योग

कुंडली में यदि बुध, गुरू व द्वितीयेश का दृष्टि-युति संबंध दशम भाव या दशमेश से हो, तो जातक बैंक अधिकारी, वित्त प्रबंधक या लेखाकार बनता है।

गुरू मंत्रणा का नैसर्गिक कारक ग्रह है। यदि यह दशम भाव, पंचम भाव, बुध या द्वितीय भाव से संबंध करे, तब भी जातक लेखाकार बनकर धन व मान-प्रतिष्ठा पाता है।

लेक्चरार या प्रोफेसर बनने के योग

पंचमेश व चतुर्थेश का राशि परिवर्तन, दशमेश शुक्र का लाभस्थ होकर पंचम भाव को देखना तथा पंचमेश गुरू की दशम भाव पर दृष्टि, शिक्षा के क्षेत्र से आजीविका का योग बनाती है। दशमेश का संबंध बुध व गुरू से होने पर जातक लेक्चरार बनता है।

प्रतियोगिता परीक्षाएं

पंचम भाव चूंकि बुद्धि से सम्बन्ध रखता है । अतः प्रतियोगिता की परीक्षाएं (Competitive Exams.)  आदि का विचार इस स्थान से करना चाहिए। भाव, भावाधिपति तथा भावकारक (यहां बुध) का सामान्य नियम यहां भी लागू होता है ।

प्रतियोगिता में सफलता पाने के योग

कुंडली में प्रतियोगिता (Competitions) या प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए मुख्य रूप से छठा घर (शत्रु/संघर्ष), दशम घर (कर्म/करियर), और पंचम घर (बुद्धि/शिक्षा) का मजबूत होना जरूरी है। छठा भाव, उसका स्वामी और मंगल का बलवान होना सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है, जो संघर्ष क्षमता व साहस बढ़ाते हैं।

प्रतियोगिता में सफलता पाने के प्रमुख ज्योतिषीय योग

1. छठा घर बलवान हो और उसका स्वामी केंद्र या त्रिकोण में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो प्रतियोगिता में विजय मिलती है।

2. मंगल का प्रभाव: तीसरे भाव का स्वामी मजबूत हो या मंगल दशम भाव (कर्म भाव) से संबंध बनाए, तो प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर में सफलता मिलती है।

3. पंचमेश और नवमेश का संबंध: पंचम भाव (विद्या) और नवम भाव (भाग्य) का संबंध प्रतियोगिता में सफलता दिलाता है।

4. सूर्य और राहु की स्थिति: उच्च प्रशासनिक पदों के लिए सूर्य और राहु की स्थिति बली होनी चाहिए।

2. बुधादित्य योग (सूर्य+बुध): जब सूर्य और बुध किसी अनुकूल भाव (1, 4, 5, 10) में युति करते हैं, तो यह उच्च बौद्धिक क्षमता और परीक्षा में सफलता प्रदान करता है।

4. गुरु-चंद्रमा (गजकेसरी योग): यदि केंद्र में गजकेसरी योग बने, तो यह जातक को अत्यधिक सफलता दिलाता है।

सफलता के लिए मुख्य ग्रह

  • सूर्य: आत्मविश्वास और नेतृत्व के लिए।
  • बुध: बुद्धि और तार्किक क्षमता के लिए।
  • गुरु (बृहस्पति): ज्ञान और निर्णय क्षमता के लिए।
  • मंगल: साहस और मेहनत के लिए।

विज्ञान योग

परिभाषा – जब अष्टमेश तथा तृतीयेश एकत्रित हो और बलवान् हो तो विज्ञान योग बनता है।

फल – इस योग मे जन्म लेने वाला मनुष्य विज्ञान (Science) जानने वाला, अनुसन्धान मे रुचि रखने वाला आविष्कारक (Inventor ) तथा खोजी (Discoverer ) होता है।

अष्टम “गभीर खोज” का स्थान है और भावात् भावम के सिद्धान्तानुसार तृतीय भी भारी खोज आदि का स्थान हुआ। दोनों भावो के स्वामियो का परस्पर योग खोज अनुसन्धान आविष्कार का द्योतक है। विशेषतया जबकि दोनो पर शुभ प्रभाव भी हो।

कुंड्ली में शिक्षा के योग

उदाहरण – यह कुण्डली जगत् विख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टाइन की  है जिस ने “सापेक्षवाद” (Theory of relativity) को ससार के सामने रखा। यहां शनि अष्टमेश है और सूर्य तृतीयेश दोनो प्रमुख दशम केन्द्र मे बलवान् होकर बल्कि दो नैसर्गिक शुभ ग्रहों बुध तथा शुक्र के साथ होकर स्थित है।


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