पापकर्तरी योग

परिभाषा – लग्न से दूसरे भाव तथा बारहवें भाव में पाप ग्रह या अशुभ ग्रह स्थित हों तो पापकर्तरी योग बनता है।

फल – पापकर्तरी योग में जन्म लेनेवाला व्यक्ति पाप करनेवाला कुचक्र रचने में प्रवीण, भिक्षुक और मलिन चित्त होता है।

यह योग बडा प्रभावशाली होता है । यह योग जिस भी भाव पे बन जाये अर्थात जिस भी भाव के दूसरे और बारहवें पाप ग्रह बैठ जाये उस भाव का फल बहुत कम कर देते है।

इसी प्रकार जिस भी ग्रह के दूसरे और बारहवें पाप ग्रह बैठ जाये उस ग्रह का फल बहुत कम कर देते है।

शुभकर्तरी योग

परिभाषा – लग्न से दूसरे भाव तथा बारहवें भाव में शुभ ग्रह हो तो शुभकर्तरी योग बनता है ।

फल– शुभकर्तरी योग में जन्म लेने वाला जातक तेजस्वी होता है। उसके जीवन में आय के कई स्रोत होते हैं तथा वह अर्थ संचय में प्रवीण होता है। शारीरिक दृष्टि से भी ऐसा जातक स्वस्थ, सबल और पुष्ट होता है ।

शुभ योग

परिभाषा – यदि जन्म लग्न शुभ ग्रह से युक्त हो तो शुभ योग होता है।

फल – शुभ योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति प्रसिद्ध वक्ता होता है। उसकी वाणी में मन्त्रमुग्ध करने की शक्ति होती है तथा जनता की भावनाओं को अपने पक्ष में करने की कला उसे आती है। ऐसा व्यक्ति रूपवान, सदाचारी तथा विविध सद्गुणों से युक्त होता है।

अशुभ योग

परिभाषा – यदि जन्म लग्न पाप ग्रह या अशुभ ग्रह से युक्त हो अशुभ योग बनता है ।

फल – इस योग को रखने वाला व्यक्ति कामी होता है तथा दूसरों का पैसा हड़प करता है। वह जीवन में असफल रहता है तथा दुर्भाग्य उसे पग-पग पर बाधा पहुँचाता रहता है।

 दरिद्र योग

परिभाषा – लग्न या चन्द्रमा से चारों ही केन्द्र स्थान (1, 4, 7, 10) खाली हों (उनमें कोई भी ग्रह न हो) या उन चारों केन्द्र स्थानों में पाप ग्रह हों तो दरिद्र योग होता है।

फल – दरिद्र योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे अरबपति के घर में ही जन्म क्यों न ले तो भी उसे दरिद्र जीवन बिताने को मजबूर होना ही पड़ता है तथा आजीविका के लिये दर-दर भटकना पड़ता है ।

टिप्पणी – विद्वानों ने उपर्युक्त योग के अतिरिक्त निम्न योग भी दरिद्र योग माने हैं-

1. चन्द्रमा सूर्य के साथ किसी नीच राशिस्थ ग्रह से देखा जाता हो एवं पाप अंश में हो तो दरिद्र योग बनता है।

2. लग्नगत क्षीण चन्द्रमा से अष्टम स्थान में कोई पाप ग्रह बैठा हो और लग्न पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो भी दरिद्र योग होता है ।

3. राहु के साथ चन्द्रमा बैठा हो और पाप ग्रह से दृष्ट हो तो जातक निश्चित ही दरिद्र जीवन बिताता है।

4. यदि चन्द्रमा किसी नीच राशिगत या शत्रु ग्रह से दृष्ट हो या शत्रु ग्रह के साथ हो तो भी दरिद्र योग होता है।

5. नीच राशि पर या शत्रुक्षेत्री चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में अथवा त्रिकोण में हो और चन्द्रमा से 6, 8 या 12वें भाव में गुरु पड़ा हो तो भी दरिद्र योग बनता है ।

6. चन्द्रमा पाप ग्रह के नवांश में शत्रुदृष्ट, चर राशिस्थ या चर अंश में हो और उसे गुरु न देखता हो तो भी दरिद्र योग होता है और ऐसा जातक पूर्ण दरिद्र जीवन बिताता है।

7. नीच राशि में या शत्रु ग्रह में या पाप ग्रह के वर्ग में शनि और शुक्र परस्पर एक-दूसरे को देखते हों या दोनों एक ही राशि में हों और ऊपर वाले लक्षण घटित होते हों तो जातक राजकुल में जन्म लेकर भी दरिद्र जीवन बिताता है।

लग्नाधि योग

परिभाषा – लग्न से छठे, सातवें और आठवें भाव में शुभ ग्रह हों तथा उन पर पाप ग्रहों की दृष्टि न हो और न इनके साथ ही पाप ग्रह हों तथा चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह हो तो लग्नाधि योग बनता है ।

फल – लग्नाधि योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति विद्वान होता है तथा उसकी विद्वता का लोहा दूसरे भी मानते हैं । शारीरिक रूप से भी ऐसा व्यक्ति हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ और सबल होता है तथा अधिकतर वीतरागी या साधु स्वभाव वाला व्यक्ति होता है। सांसारिक प्रपंचों में वह कम उलझता है तथा विख्यात होता है ।

टिप्पणी – अधि योग एवं लग्नाधि योग में मुख्य अन्तर यह है कि अधि योग में चन्द्र मुख्य होता है तथा चन्द्र स्थान से ही गणना होती है, परन्तु लग्नाधि योग में लग्न ही मुख्य होता है तथा लग्न स्थान से गणना होती है ।

इसके अतिरिक्त लग्नाधि योग में दो शर्तें और भी हैं। प्रथम तो लग्न से 6, 7, 8वें स्थान में शुभ ग्रह ही हों और उनके साथ दूसरा कोई ग्रह न हो एवं दूसरा लग्न से चौथा भाव शुभ ग्रह से युक्त हो ।

कुछ विद्वान चौथे भाव में शुभ ग्रह की आवश्यकता नहीं समझते परन्तु चतुर्थ भाव में पाप ग्रह नहीं हो, ऐसा वे जरूर मानते हैं। लग्नाधि योग भी अधि योग की तरह ही प्रभावोत्पादक एवं राजयोग की तरह है।

राज्य लक्षण योग

परिभाषा – गुरु, शुक्र, बुध और चन्द्रमा चारों ही लग्न में हों या केन्द्र स्थानों में हों तो राज्य लक्षण योग बनता है ।

फल – जिस जातक की कुण्डली में यह योग होता है वह जीवन में बहुत उन्नति करता है, जीवन की सभी सुख-सुविधाएँ भोगता है और पूर्ण वाहन सुख प्राप्त करता है। उसका व्यक्तित्व आकर्षक होता है ।

टिप्पणी – सुन्दरता और व्यक्तित्व प्रदान करने वाले ग्रह हैं बुध और चन्द्र । यदि ये दोनों ग्रह बलवान और कारक बन कर बैठे हों तो जातक को विशेष सुन्दर बना देते हैं, पर यदि ये दोनों ग्रह अकारक, निर्बल अथवा शत्रु क्षेत्री हों तो जातक के व्यक्तित्व में विशेष निखार नहीं समझना चाहिए।

गुरु, शुक्र और बुध के साथ ही चन्द्रमा भी केन्द्र स्थानों में हो तो पूर्ण राज्य लक्षण योग बनता है, परन्तु यदि केवल चन्द्र केन्द्र में न होकर त्रिकोण स्थान में ही हो तो भी राज्य लक्षण योग समझना चाहिए। यद्यपि यह वैसा प्रभावोत्पादक नहीं माना जाता है। पूर्ण राज्य लक्षण योग रखने वाले के जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रहता ।

वंचना चोरभेती योग

परिभाषा – लग्न का स्वामी कुण्डली में कहीं पर भी राहु, शनि या केतु के साथ हो एवं लग्न में पाप ग्रह स्थित हो तो वंचना चोरभेती योग बनता है ।

फल – इस योग को रखने वाला व्यक्ति हमेशा स्वयं में हीन भावना अनुभव करता है तथा ठगों, चोरों, जेबकतरों अथवा धोखे से डरता रहता है ।

टिप्पणी – ऐसा व्यक्ति अस्थिरमति वाला और मन में संशय रखने वाला होता है। हर समय वह सशंकित रहता है कि कोई उसे ठग न ले या उसकी जेब न काट ले अथवा कोई उसे धोखा न दे दे । ऐसा व्यक्ति न तो किसी पर विश्वास करता है और न किसी से मन की बात खुल कर कहता ही है।

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