लाल किताब के अनुसार पूजा कैसे करनी चाहिए ?
लाल किताब के अनुसार किस को पूजा नहीं करनी चाहिए और कैसे करनी चाहिए ?
जैसे दूसरा भाव खाली होने पर और आठवें भाव में कोई ग्रह होने पर घर में मन्दिर बनाकर पूजा नही करनी चाहिए और किसी धर्म स्थान पर भी अधिक नही जाना चाहिए। जैसे कि आप लोगो ने देखा होगा। अपने आस-पास बहुत से लोग ऐसे होंगे जो खूब पूजा करते हैं बड़ा-सा मंदिर बना कर रखते हैं। वे अकसर परेशान ही पाये होंगे। भले ही उनके पास रूपया-पैसा हो लेकिन बहुत-सी परेशानियां भी होती हैं।
यदि दूसरा भाव खाली हो और आठवें भाव में सूर्य हो तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो उसे बच्चे का सुख नही होगा, और सूर्य ग्रह से जो वस्तुएं प्राप्त होती हैं। उनका नुकसान होगा, लड़के और शिक्षा का। जैसे पिता के सुख में कमी आयेगी, हड्डी के रोग, आँख की रोशनी कम होना, दिल की बीमारी होगी।
यदि दूसरा भाव खाली होगा और आठवें भाव में चन्द्र ग्रह होगा। तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो चन्द्र की वस्तुओं का नुकसान होगा। जैसे-माता, दादी, सास, ताई, नानी के सुख में कमी आयेगी। इससे रूपये-पैसे में कमी आयेगी। छाती (फेफड़े) और कफ संबंधी रोग हो सकते हैं।
यदि दूसरा भाव खाली होगा और आठवें भाव में मंगल ग्रह हो। तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो मंगल की वस्तुओं का नुकसान होगा। जैसे भाई के सुख में कमी, खून में कमी या कोई खराबी, फोड़े-फुंसी का होना, किसी से भी अच्छे संबंध नही रहते।
यदि दूसरा भाव खाली हो और आठवें भाव में बुध ग्रह हो । तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो बुध की वस्तुओं का नुकसान होगा। जैसे – व्यापार का बिल्कुल खत्म हो जाना, बहिन के सुख में कमी, मौसी, बुआ, साली के सुख में कमी, आंतों की बीमारी।
यदि दूसरा भाव खाली हो और आठवें भाव में बृहस्पति ग्रह हो। तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो बृहस्पति की वस्तुओं का नुकसान होगा। जैसे बाबा का सुख कम, शिक्षा का और लड़के का, सामान्य-ज्ञान सांस की बीमारी, कमर में दर्द, शुगर, पैर संबंधी रोग और कूल्हें में रोग आदि ।
यदि दूसरा भाव खाली हो और आठवें भाव में शुक्र ग्रह हो । तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो शुक्र की वस्तुओं का नुकसान होगा। जैसे – पत्नी सुख में कमी, वीर्य संबंधी बीमारी, गुर्दे का रोग, चमड़ी रोग आदि।
यदि दूसरा भाव खाली हो और आठवें भाव में शनि ग्रह हो । तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो शनि की वस्तुओं का नुकसान होता है। ताऊ, चाचे के सुख में कमी, टांग संबंधी रोग, व्यापार में हानि आदि ।
यदि दूसरे भाव में राहु हो और आठवें भाव में केतु हो। तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो केतु की वस्तुओं का नुकसान होता है। जैसे – लड़के के सुख में कमी, जोड़ों के दर्द, हर्निया का रोग आदि ।

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यदि भाव में केतु हो और आठवें में राहु ग्रह हो । तब यदि व्यक्ति धर्मस्थान जाकर अधिक पूजा करेगा तो राहु की वस्तुओं का नुकसान होता है। ससुराल के सुख में कमी, नानको के सुख में कमी, ऐसा ज्वर होना जो मुश्किल से उतरे, अचानक वाहन संबंधी दुर्घटना होना, चोट लगना, कोई भी नुकसान अचानक होगा जिसका व्यक्ति को पता नही लगेगा।
यदि दूसरा भाव खाली हो और आठवें भाव में कोई ग्रह हो ऐसे व्यक्ति को एकांत स्थान में पूजा करनी चाहिए।
राहु, केतु यदि दूसरे, आठवें भाव में हो। ऐसा व्यक्ति किसी धर्म स्थान पर जायेगा और कुछ भी दान करेगा रूपया-पैसा या कोई और वस्तु उसका लाभ उस व्यक्ति को नही होगा। क्योंकि वह जो भी दान करेगा वह राहु-केतु उठाकर ले जायेंगे (चोरी करके ले जायेंगे)। ऐसे व्यक्ति को कोई भी धर्म स्थान पर कोई भी वस्तु दान नही करनी चाहिए।
यदि दूसरे भाव में अगर चन्द्र ग्रह हो तो ऐसे व्यक्ति को घंटी बजाकर पूजा-पाठ नही करनी चाहिए। यदि ऐसा करेगा तो बे-औलाद हो सकता है। औलाद का सुख नही होगा।
लाल-किताब घर में पूजा करने के लिए मना नही करती है। सिर्फ घर में मंदिर बनाने के लिए मना करती है। घर में मंदिर बड़ी-बड़ी और ठोस मूर्तियां लगाकर मंदिर नही बनाना चाहिए।
आपने प्राचीन बातें सुनी होंगी कि मंदिर गाँव-शहर की सरहद पर होता था। मंदिर के आजू-बाजू कोई रिहाइशी मकान नही होते थे। किसी औरत को रजोवृत्ति के दिनों में किसी धर्म स्थान पर जाना मना है। जब घर में आप मंदिर बनायेंगे तब रजोवृत्ति के दिनों पत्नी, माँ, बेटी को कहाँ भेजेंगे ? मंदिर-घर में पवित्र नहीं रख सकते आप।
मन्दिर कभी भी बन्द नहीं होते जब भी आप कभी कहीं 8 – 10 दिनों के लिए पूरे परिवार सहित कहीं घूमने फिरने जाते हैं तो घर के मंदिर का क्या होगा ? या किसी और कारण आप घर के मंदिर का ध्यान न रख पाएं तो आप मन्दिर का अपमान करेंगे और जिन देवी-देवताओं को आपने मन्दिर में स्थापित किया है उनका भी अपमान होगा। इसलिए घर में मंदिर नही बनाना चाहिए।
पूजा घर में कर सकते हैं आप, किसी भी इष्ट देव की । कागज़ की फोटो लगाकर । कागज़ की फोटो का कोई वहम् नही है। अकसर देखा जाता है लोग कई देवी-देवताओं की एक साथ पूजा करते हैं और सारी जिन्दगी दुःखी रहते हैं। वे ऐसा करके हर देवी-देवता का एक-दूसरे से टकराव करवा देते हैं।
कुण्डली में नौवें भाव या पांचवें भाव में जो ग्रह हो उसी भाव के इष्ट की पूजा-पाठ करनी चाहिए। जैसे सूर्य हो तो विष्णु जी महाराज, चंद्र हो तो शिवजी महाराज, मंगल हो तो हनुमान जी महाराज, बुध हो तो दुर्गा माता, बृहस्पति हो तो ब्रह्मा जी महाराज, राहु हो तो सरस्वती देवी और केतु हो तो गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। इसके अनुसार पूजन का चुनाव करना चाहिए।
यदि किसी की कुण्डली का नौवां और पांचवा भाव दोनो ही खाली हों तो उन भाव में जो राशियां हों उनके स्वामी के ग्रह की पूजा करनी चाहिए।
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