कुंडली में लग्न और लग्नेश का फलादेश

लग्नेश का विभिन्न भावों में फल

1. प्रथम भाव में – जातक अपने प्रयास पर जिन्दा रहता है, उसकी स्वतन्त्र विचारधारा होती है, उसकी दो पत्नी होगी या एक विवाहित और दूसरी गैर कानूनी । यदि लग्नाधिपति लग्न में अच्छी स्थिति में हो तो वह व्यक्ति अपने समुदाय या देश में प्रसिद्ध होता है ।

2. द्वितीय भाव – अधिक लाभ होगा, शत्रुओं से परेशानी तथा चिन्ता, उत्तम आचरण, सम्मानित तथा उदार दिल वाला । यदि वह ग्रह उत्तम स्थिति में हो तो वह अपने संबंधियों के प्रति अपना कर्तव्य आनन्द पूर्वक निभायेगा और महत्त्वाकांक्षी होगा । उसकी आंखें सुन्दर होंगी और उसे पूर्वानुमान का आशीर्वाद होगा ।

3. तृतीय भाव – इसमें जातक साहसी, भाग्यशाली, सम्मानित, दो पत्नियों वाला तीव्र बुद्धि वाला तथा हमेशा खुश रहने वाला होता है । यदि लग्नाधिपति उत्तम स्थिति में हो तो जातक अपने भाइयों की मदद से जीवन में उत्थान करता है। वह गायक या गणितज्ञ के रूप में प्रसिद्ध होगा जो राशि के स्वरूप और उससे संबंधित ग्रहों पर आधारित होगा ।

4. चतुर्थ भाव – माता-पिता से सुख होगा, अधिक भाई होंगे, भौतिकवादी, अच्छे शरीर वाला, देखने में उत्तम तथा आचरण वाला होगा ।

यदि चौथे भाव का स्वामी उत्तम स्थिति में है तो उस व्यक्ति को भू-सम्पति प्राप्त होगी । वह धनी, सुखी, प्रसिद्ध व्यक्ति होगा तथा अनेक गाड़ियों का स्वामी होगा ।

5. पंचम भाव – पहला बच्चा नहीं रहेगा, बच्चों से अधिक सुख प्राप्त नहीं होगा, तुनकमिजाज, किसी के अधीन कार्य करने वाला तथा दूसरों की सेवा करने वाला होगा ।

यदि लग्नेश बली है तो शासकों या शक्तिशाली राजनीतिक पार्टियों की कृपा प्राप्त होंगी। व्यापार या राजनयिक सेवाओं में लग जाएगा। यदि पंचम भाव का स्वामी उत्तम स्थिति में हो तो वह देवी देवताओं को वश में कर लेगा ।

6. षष्ठ भाव — तीसरे भाव में रहकर लग्नाधिपति द्वारा दिए गए फलों के अतिरिक्त निम्नलिखित बातों पर भी ध्यान देना चाहिए वह कर्ज में रहेगा किन्तु जब लग्नाधिपति की दशा आएगी तो कर्ज समाप्त हो जाएगा ।

यदि अधिपति उत्तम स्थिति में हो तो जातक सेना में प्रवेश पाता है और कमाण्डर या कमाण्डर इन चीफ तक बन जाता है, बशर्ते कि अधिपति की दशा सही समय पर आई हो । अथवा वह चिकित्सा या स्वास्थ्य सेवाओं का प्रधान बनता है । अथवा डाक्टर या सर्जन बनता है। यहां पर अन्य प्रभावों पर समुचित विचार कर लेना चाहिए।

7. सप्तम भाव – पत्नी जिन्दा नहीं रहेगी या एक से अधिक विवाह होगा। बाद में जीवन में सांसारिक कार्यों से विरक्ति हो जाती है और संन्यासी जीवन बिताने की कोशिश करता है । अन्य तथ्यों के आधार पर जातक अमीर या गरीब होगा । बहुत यात्रा करेगा ।

यदि अच्छी स्थिति में हो तो वह अपना अतिरिक्त समय विदेश में बिताएगा और स्वतन्त्र जीवन वाला रहेगा । अथवा वह अपने सास-ससुर के हाथ का खिलौना बनकर रह जाएगा ।

8. अष्टम भाव – विद्वान, जुआरी प्रवृत्ति का, तन्त्र विद्या या ब्रह्म विद्या में रुचि रखने वाला और दुराचारी होगा ।

यदि अधिपति बली है तो जातक दूसरों की सहायता करता है, उसके अनेक मित्र होते हैं धर्म में रुचि रहती है तथा जीवन का अन्त शान्तिपूर्वक व अचानक हो जाता है।

9. नवम भाव – सामान्यतः भाग्यशाली, दूसरों की रक्षा करने वाला तथा धर्म में रुचि रखने वाला होता है। यदि वह विष्णु का उपासक है तो एक उत्तमवक्ता, पत्नी और बच्चों से सुखी तथा धनी होगा ।

यदि अधिपति उत्तम स्थिति में हो तो पैतृक सम्पत्ति विरासत में मिलेगी । ऐसे जातक का पिता एक प्रसिद्ध, लोक प्रेमी तथा ईश्वर से डरने वाला होगा ।

10. दशम भाव – व्यावसायिक सफलता तथा उत्कृष्ट व्यक्तियों से सम्मान पायेगा, अन्वेषक होगा तथा अपने क्षेत्र में या व्यवसाय में विशेष ज्ञान प्राप्त करेगा ।

11. एकादश भाव – यदि कारोबारी है तो कारोबार में हमेशा लाभ होगा । जातक को वित्तीय तंगी का सामना नहीं करना पड़ेगा ।

उसका बड़ा भाई उसी का ऋणी रहेगा। इस योग में शामिल होने वाले अन्य ग्रहों द्वारा दिए गए संकेतों के आधार पर उसे कारोबार से अत्यधिक लाभ होगा ।

12. द्वादश भाव – इस स्थिति में वही परिणाम होता है जो आठवें भाव का है । इसके अतिरिक्त काफी हानि होगी, धार्मिक स्थानों की यात्रा करेगा और कारोबार में सफलता प्राप्त नहीं होगी । विरासत में प्राप्त धन को दान और अन्य कारणों में खर्च करेगा। वह अपनी भावना पर नियन्त्रण रखेगा तथा अपना जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित कर देगा ।

लग्न में विभिन्न ग्रहों की स्थिति

नीचे दिए गए विवेचन भावों में स्थित ग्रहों के लिए हैं। इसमें उन पर आ रही दृष्टि का विचार नहीं किया गया है। यदि प्रथम भाव में स्थित किसी ग्रह पर कोई दृष्टि हो या किसी अन्य ग्रह के साथ युति हो तो भाव स्थिति के अनुसार उसके प्रभाव में परिवर्तन किया जाएगा। नीचे दिए गए ब्यौरे को प्रश्नाधीन कुंडली की आवश्यकताओं के अनुसार लागू करना चाहिए।

1. सूर्य प्रथम भाव में नैतिक, न्यायवादी, महत्वाकांक्षी अधिकार पसन्द, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन शक्ति वाला होगा। उसकी हंसमुख प्रवृत्ति तथा आशावादिता से उसे विख्यात बनने में सहायता मिलेगी। इससे उसके व्यक्तित्व में मदद मिलती है और उसके विचार नर्म होते हैं । यदि शनि या मंगल के साथ हों तो इससे तिल का संकेत मिलता है और गर्म प्रवृत्ति होती है। खून अशुद्ध हो जाता है और सारे शरीर में खुजली होती है। बुखार प्रदाह और आंख की बीमारी की भी आशा की जा सकती है ।

2. चन्द्रमा प्रथम भाव में – जातक उच्छृंखल रोमांसवादी, और आधुनिक हो हो जाता है। आरामतलब मनोभाव के कारण उसके अन्दर पर्याप्त बेचैनी रहती है । उसके भाग्य में परिवर्तन होता रहता है। इससे आदमी आदर्शवादी, यात्रा करने वाला और अन्वेषक बन जाता है । यदि शनि की युति हो तो वह हमेशा चिन्तित रहेगा।

यदि चन्द्रमा के साथ मंगल हो तो स्त्री के मामले में मासिक की अनियमितता का संकेत मिलता है। सामाजिकता उसकी विशेषता होती है। वह अपने व्यवसाय में सफल होगा। इससे जनता के सम्पर्क में आएगा।

लग्न में चन्द्रमा के साथ राहु की युति होने पर उन्माद की प्रवृत्ति का संकेत मिलता है और चन्द्रमा के साथ बृहस्पति की युति होने पर मस्तिष्क का उत्थान होता है ।

3. मंगल प्रथन भाव में – यह गर्म स्वभाव, साहस, आत्मविश्वास और उद्यमी बनाता है। इस जातक को व्यावहारिक सक्षमता होगी और आजादी तथा स्वतन्त्रता का प्रेमी होगा । वह पराजय के तिरस्कार के खतरे से दुस्साहसी हो जाता है। इससे उसका स्वभाव उच्छृंखल बन जाता है। शरीर पर तिल होते हैं और देखने में सुन्दर होता है।

यदि कोई अनुकूल योग न हो तो पारिवारिक जीवन दुखद हो जाता है । शरीर का दुरुपयोग करने के कारण स्वास्थ्य विगड़ सकता है । दुर्घटना हो सकती है। दृष्टियों की सावधानी पूर्वक जांच कर लेनी चाहिए। कटने, जलने आदि की सम्भावना का खतरा रहता है ।

4. बुध प्रथम भाव में – इस स्थिति में जातक विनोदी होता है । वाक् चातुर्य की तत्परता और मानसिक पटुता पाई जाती है। जातक विशेषकर ग्रहों के अध्ययन में प्रवीण होता है । यदि शुक्र की उत्तम दृष्टि हो तो जातक संगीतज्ञ और मेघावी होता है । किसी चीज को प्राप्त करना उनकी विशेषता होती है। बुध आदमी को प्रतिभाशाली बनाता है। यदि लग्न में राहु या केतु हो तो जातक उत्तेजना के कष्ट से पीड़ित होता है।

5. बृहस्पति प्रथम भाव में – जातक का व्यक्तित्व सम्मोहक होता है। इसमें आशावादी चेतना, प्रसन्नचित मनोभाव, और आकर्षक आचरण का संकेत मिलता है । यदि पांचवां भाव पीड़ित न हो तो जातक के अधिक पुत्र होंगे। विशेषकर अधिक खुराक खाने के कारण स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ेगा। यदि साथ में राहु हो तो वह पाप करेगा, शरीर झुका हुआ होगा । इस ग्रह के अधीन वकील, प्रोफेसर, लेखक, धर्मशास्त्री आदि आते हैं। ऐसा व्यक्ति एक प्रभावी नेता बनता है। अशुद्ध रक्त के कारण रोगग्रस्त होता है ।

6. शुक्र प्रथम भाव में – यह एक भाग्यशाली योग है, यदि लग्न मकर या कुम्भ हो तो वह अधिक भाग्यशाली होता है । जातक का स्वभाव सौहार्दमय तथा प्रसन्न होता है। वह कला का प्रेमी होता है। उसमें मनोरंजन की आकांक्षा और काम की इच्छा होती है । जातक संगीत, नाटक और गानों में रुचि रखता है । सेन्ट, फूलों आदि सुगन्धों का शौकीन होगा। इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति की विपरीत सेक्स वाले प्रशंसा करते हैं । साधारणतया उत्तम भाग्य का संकेत मिलता है ।

जातक पत्नी/पति का प्रेमी होता है। उसका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक होता है। शादी जल्दी होती है । यदि पीड़ित हो तो विवाहित जीवन में असामन्जस्य रहता है ।

7. शनि प्रथम भाव में ― विदेशी रिवाजों को आसानी से नकल और अनुकरण करता है किन्तु यदि शनि पीड़ित न हो तो दूसरों का कल्याण करता है । साधारणतया आत्मविश्वास पाया जाता है। इसमें नैतिक स्थिरता भी पाई जाती है। शान्त और गम्भीर मनोभाव होता है। शरीर दुबला पतला और क्षीण होता है। वह उत्तरदायित्व से विमुख हो सकता है शनि की इस स्थिति में निष्क्रिय आदत हो जाती है।

लापरवाही के कारण हानि और सुअवसर का अभाव संभव है । यदि लग्न पर शनि की दृष्टि हो तो भी एसे ही परिणाम मिलेगे। जीवन के आरम्भ में दुर्भाग्य रहता है ।

8. राहु प्रथम भाव में – सामान्यतः स्वास्थ्य असन्तोषजनक रहेगा और डाक्टरी उपचार से भिन्न विधि से उपचार कराएगा। उसका झुकाव जादू की ओर होता है तथा उसमें नैसर्गिक गंभीरता पाई जाती है। दूसरे के प्रति मिथ्याचारी रहता है । यह योग विवाह के लिए खराब है। राहु में सामान्यतः शनि की विशेषता आ जाती है।

9. केतु प्रथम भाव में – आध्यात्मिक शक्ति की संभावना है। इसमें कमजोर शरीर और क्षीणं आकृति का संकेत मिलता है। अस्थिरता और कपट का आचरण पर प्रभाव पड़ता है। विकृत कल्पना, आश्चर्यजनक अभिरुचि, उत्तेजना की प्रवृत्ति और विचरणशील मनोभाव का संकेत मिलता है । यदि अनुकूल दृष्टि या युति न हो तो विवाहित जीवन सुखी नहीं होता ।

अन्य महत्वपूर्ण योग

1. यदि लग्न का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव के स्वामी के साथ हो और उस पर क्रूर ग्रह की दृष्टि या युति हो तो उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा । यदि उस पर किसी सौम्य ग्रह की दृष्टि हो तो इस अनिष्ट की भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए ।

2. यदि लग्नाधिपति लग्न में हो और क्रूर ग्रह की युति हो तो जातक शारीरिक रूप से सुखी नहीं होगा ।

3. यदि सभी ग्रह लग्न पर दृष्टि डाल रहे हों तो वह शक्तिशाली, घनी तथा अनेक वर्षों तक जीवित रहने वाला होगा ।

4. यदि लग्नेश बली हो, उत्तम ग्रह केन्द्र में पड़े हों और लग्न में अनिष्ट ग्रहों की दृष्टि न हो तो जातक शरीर से काफी सुखी रहता है ।

5. यदि लग्न के स्वामी के साथ अनिष्ट ग्रह की युति हो और राहु लग्न में हो तो उस व्यक्ति के साथ कपट होता है ।

6. यदि लग्न में राहु, मंगल और शनि हों तो उस व्यक्ति को लिंग सम्बन्धी बीमारी होती है ।

7. यदि वृहस्पति या शुक्र लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में पड़े हों तो वे उत्तम फल देते हैं ।

8. यदि लग्नाधिपति चर राशि में हो और उस पर उस राशि के स्वामी की दृष्टि हो तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य हमेशा ठीक रहता है और वह भाग्यशाली होता है।

9. यदि लग्नाधिपति आठवें भाव में हो तो जातक कमजोर होता है। किन्तु उस पर शुभ दृष्टि हो तो इसकी भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए।

10. जिस भाव में लग्नाधिपति पड़ा है उस भाव का स्वामी यदि खराब स्थिति में हो तो जातक बीमार रहेगा ।

11. यदि लग्न में शनि हो तो उसके यहां चोरी होगी और उसके साथ धोखा होगा ।

12. यदि लग्नाधिपति मंगल या शनि हो और उस भाव में अनिष्ट ग्रह पड़े हों या उस पर अनिष्ट ग्रह की दृष्टि हो तो जातक के सिर पर चोट लगती है ।

13. यदि शुष्क ग्रह (सूर्य, मंगल और शनि) लग्न में हों तो वह व्यक्ति दुबला पतला होता है । यदि लग्न कोई भी शुष्क राशि (मंगल, सूर्य और शनि के स्वामित्व वाली राशि) हो तो उस जातक का शरीर दुर्बल होगा।

यदि लग्नाधिपति के साथ शुष्क ग्रह की युति हो तो भी फल वही होगा।

यदि लग्न कर्क, वृश्चिक या मीन हो और उसमें अच्छे ग्रह पड़े हों तो उसका शरीर गोल होगा।

यदि लग्नाधिपति जलीय तत्व ग्रह (शुक्र और चन्द्र) हो तथा वह बली हो, अच्छे ग्रहों की युति हो तो जातक बली होता है ।

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यदि बृहस्पति लग्न में हो या जलीय तत्व राशि से लग्न पर दृष्टि डाल रहा हों अथवा लग्न जलीय तत्व राशि हो जिसमें सौम्य ग्रह हों तो शरीर मजबूत होता है ।

14. यदि सूर्य लग्न में हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो जातक को दमा या फेफड़े की बीमारी होती है ।

15. यदि मंगल लग्न में हो और उस पर सूर्य या शनि की दृष्टि हो तो उसे घाव होता है या दुर्घटना होती है ।

16. यदि लग्नेश वर्गोतम में, उच्च में, मित्र राशि में हो ओर अच्छे ग्रहों की युति या दृष्टि हो तो वह जीवन में बहुत सुखी रहेगा ।

17. यदि प्रथम, एकादश और द्वादश भावों में सोम्य ग्रह हों और बली स्वामी त्रिकोण में हो तो वह आरम्भ में और मध्यावस्था में सुखी रहेगा।

18. यदि लग्नेश बली हो या बृहस्पति लग्न में हो तो वह जीवन के आरम्भ में सुखी रहेगा ।

19. यदि लग्न और लग्नेश दो क्रूरं ग्रहों (शनि और राहु) के बीच पड़े हों तो जातक चोरों के कारण पीड़ित रहेगा। राहु १२ वें भाव में उतना नुकसान नहीं देता जितना वह दूसरे भाव में देता है जबकि शनि दूसरे भाव में उतना नुकसान नहीं देता जितना बारहवें भाव में देता है।

20. यदि लग्न में अनेक अनिष्ट ग्रह पड़े हों तो वह व्यक्ति हमेशा कष्ट में रहेगा ।

21. यदि लग्नेश अच्छी स्थिति में हो तो यह अपने आप में एक परिसम्पत्ति है जो उस व्यक्ति को आजीवन सुख देती है। इसके साथ ही यदि दशम भाव में कोई ग्रह हो तो वह इसमें चार चांद लगा देता है। इन दोनों के साथ वह कुंडली भाग्यशाली है जिसमें कोई ग्रह द्विर्द्वादश स्थिति (एक दूसरे से १२वें या दूसरे भाव) में न हों ।

22. जब लग्नाधिपति बली हो किन्तु लग्नाधिपति जिस राशि में है उसका स्वामी कलुषित हो तो अच्छे परिणाम का अभाव रहता है और बुरे परिणाम की अधिकता होती है।

लग्न भाव का विश्लेषण करते समय चन्द्र लग्न और नवांश लग्न की स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए।

मेष लग्न

1. मानसिक प्रवृत्ति – स्वतन्त्र विचार, साहसी और भावुक ।

2. शारीरिक प्रवृत्ति – मध्यम कद, रक्तिम वर्णं।

3. सामान्य प्रवृत्ति – मेष राशि में उत्पन्न व्यक्ति वैज्ञानिक चिंतन पसन्द करते हैं। वे उद्यमी और महत्वाकांक्षी होते हैं। उनमें योजना बनाने की क्षमता होती है। वे दूसरों से मार्ग निर्देशन प्राप्त करना पसन्द नहीं करते । शीघ्र ही क्रोध में आ जाते हैं। उनकी प्रकृति उष्ण होती है । वे सुन्दरता, कला और लालित्य प्रेमी होते हैं। उन्हें व्यावहारिक ज्ञान होता है।

यदि मेष राशि पीड़ित हो तो वे सिर से सम्बन्धित रोग से पीड़ित होते हैं । यदि मेष राशि में शनि और चन्द्रमा हों तो मानसिक पीड़ा और पागलपन की भी सम्भावना है।

वृषभ लग्न

1. मानसिक प्रवृत्ति – हठी अभिमानी और महत्त्वाकांक्षी, आसानी से चापलूसी में आने वाला किन्तु बहुत ही प्यारा, कभी-कभी अविवेकी, पूर्वाग्रही और जिद्दी ।

2. शारीरिक प्रवृत्ति – इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति का कद छोटा होगा और मोटा बदन, मोटें होट और सांवला रंग होगा तथा शरीर का गठन गोलाकार होगा । सुन्दर चेहरा, आंखे और कान बड़े बड़े ललाट तथा प्रहारी तथा बड़े हाथ।

3. सामान्य प्रवृत्ति – इनके पास काफी सहनशीलता, अप्रकट शक्ति तथा ताकत होती है । वे हमेशा ही अपने विचारों का प्रयोग करते हैं। उनकी शारीरिक तथा मानसिक सहनशील शक्तियाँ वास्तव में प्रशंसनीय होती हैं। वे आमोद प्रमोद के शौकीन होते हैं, वे सुन्दरता संगीत के प्रेमी होते हैं । उनका व्यक्तित्व चुम्बकीय होता है । वे सोचते हैं कि वे अपना अधिकार जमाने के लिए पैदा हुए हैं। सामान्यतः ५० वर्ष की आयु के बाद वे उत्तेजित होने की बीमारी से पीड़ित हो जाते हैं। बच्चों के संबंध में अधिक सुख का संकेत नहीं मिलता।

मिथुन लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – उनका मस्तिष्क गतिमान होता है। पढ़ने लिखने में शौकीन होते हैं। वे सरल, विवेकशील, जीवन्त और परस्पर विरोधी, उत्तेजित तथा परेशान होते हैं।

शरीरिक प्रवृत्ति – वे कद में लम्बे तथा सीधे और गति में चंचल होते हैं । चेहरा अच्छी प्रकार से विकसित होता है।

सामान्य प्रवृत्ति – वे काफी चंचल तथा मैकेनिकल विज्ञान में निपुण बनना चाहते हैं । वे अचानक उत्तेजना से पीड़ित हो सकते हैं। वे काफी होशियार होते हैं तथा वाद-विवाद एवं साहित्यिक क्षमता उन्हें विरासत में प्राप्त होती है। यदि मिथुन में अनिष्ट ग्रह हों तो उनके स्वभाव में धोखाधड़ी की विशेषता होगी । वे छल कपट और धोखाधड़ी में पकड़े जा सकते हैं।

कर्क लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति काफी संवेदन शील, जिज्ञासु, उत्तेजित और परेशान तथा संगीत में रुचि रखते हैं ।

शारीरिक प्रवृत्ति – उनका शरीर मध्यम, चेहरा पूरा, हल्की चिपकी नाक, साफ रंग, लम्बे हाथ, लम्बा चेहरा तथा फैली हुई छाती होती है ।

सामान्य प्रवृत्ति – वे काफी तेज चमकीले और काफी मिताहारी और उतने ही मेहनती होते हैं । अपनी मितव्ययिता के कारण वे कभी-कभी काफी कंजूस भी बन जाते हैं । वे मनोरंजन के प्रेमी होते हैं। अपने परिवार और बच्चों को बहुत चाहते हैं। वे अक्सर प्रेम में निराश होते हैं। वे काफी बातूनी, आत्म विश्वासी, ईमानदार होते हैं और दूसरे के सामने झुकते नहीं। उन्हें न्याय और ईमानदारी के लिए सम्मान मिलता है। उनकी भावना मजबूत होती है । उनकी प्रवृत्ति मनोवैज्ञानिक होती है तथा नए विचारों की खोज करके लागू करते हैं । वे उतार चढ़ाव के व्यवसाय में काफी सफल होते हैं ।

सिंह लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – सिंह राशि में उत्पन्न लोग महत्वाकांक्षी, धनलोलुप, और सहृदय होते हैं तथा कला, साहित्य और संगीत के शौकीन होते हैं । वे हंसमुख तथा अनावेगी होते हैं ।

शारीरिक प्रवृत्ति – इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति देखने में आकर्षक होता है, उसके कंधे चौड़े होते हैं। पित्तदोषग्रस्त, साधारण ऊँचाई, चेहरा अंडाकार, चिन्तन मुद्रा होती है। शरीर को ऊपरी भाग का बेहतर गठन होता है ।

सामान्य प्रवृत्ति – वे जीवन की किसी भी स्थिति में अपने आप को ढाल लेते हैं । उन्हें विश्वास होता है। वे प्रेम में काफी ईमानदार होते हैं। वे धर्म मानते हैं किन्तु उनमें काफी सहन शक्ति होती है। वे अतृप्त पाठक होते हैं। जीवन में उन्हें आखिरकार उतनी सफलता नहीं मिलती जितनी आशा होती है और कभी-कभी जीवन भर संघर्ष करना पड़ता है। उनकी आकांक्षाएँ काफी हद तक पूरी नहीं होती । उनमें नैसर्गिक नीति का अभाव होता है । अतः उनके सामने अनेक कठिनाइयां आती है। वे क्षमा कर देते हैं और काफी समय तक ईर्ष्या नहीं रखते। वे उत्तेजना के रोग से पीड़ित हो सकते हैं और उनके वरिष्ठ अधिकारी साधारणतः उन्हें गलत समझ बैठते हैं ।

कन्या लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – कन्या लग्न में उत्पन्न लोग भावुक, आवेशी तथा अध्ययन के शौकीन होते हैं, वे संगीत और आधुनिक कला के प्रेमी होते हैं। उनमें आत्मविश्वास का अभाव होता है। वे औपचारिक तथा मेघावी होते हैं। उनका मस्तिष्क चंचल होता है ।

शारीरिक प्रवृत्ति – इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति मध्यम उसकी छाती उभरी हुई और यदि पीड़ित हो तो दुर्बल भी सीधी, तथा गाल स्थूल तथा ललाट उत्तम होगा ।

सामान्य प्रवृत्ति – वे युवावस्था में अपनी बुद्धि का प्रदर्शनशील तथा भावुक होते हैं और अपने हित के बारे में सावधान दूरदर्शी, मितव्ययी, राजनयिक और चतुर होते हैं । भौतिक और रसायन विज्ञान में लेखक के रूप में वे प्रगति करते हैं । दूसरों के ऊपर उनका काफी अधिकार और प्रभाव होता है। वे उत्तेजना और पक्षाघात से पीड़ित हो सकते हैं यदि यह राशि पीड़ित हो । वे चिन्तनशील स्वभाव के होते हैं ।

तुला लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – तुला लग्न में उत्पक्ष व्यक्ति आदर्शवादी, वैरसाधक, बली और निरपेक्ष होते हैं |

शारीरिक प्रवृत्ति – सामान्यतः उनका रंग साफ, मध्यम कद, शान्त, सुन्दर, बड़ा चेहरा, सुन्दर आँख, लम्बी छाती और सामान्य शरीर होता है । देखने में वे युवक लगते हैं ।

सामान्य प्रवृत्ति – इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति सामान्यतः कामुक होते हैं । वे मानव प्रकृति के निरीक्षण के शौकीन होते हैं । वे अपने विचारों से पूर्वानुमान करने के शौकीन होते हैं। वे न्याय, शान्ति, व्यवस्था और तर्क संगत लोगों को पसन्द करते हैं । वे महत्वाकांक्षी होते हैं । वे वास्तविक और व्यावहारिक लोगों की अपेक्षा अधिक आदर्शवादी होते हैं और अक्सर ख्याली पोलाव पकाने की योजना बनाते हैं । वे उतने भावुक नहीं होते जितना लोग समझते हैं। राजनैतिक नेताओं और धार्मिक सुधारकों के रूप में जनता पर उनका काफी प्रभाव जम जाता है । और कभी-कभी उनकी उत्तेजना और जोश उस सीमा तक पहुँच जाता है कि वे अपने विचार अनिच्छुक लोगों को मनवाने के लिए बाध्य कर देते हैं। वे आसानी से अनुगामी नहीं बनते । वे संगीत के बहुत प्रेमी होते हैं। उनके लिए सच्चाई और इमानदारी का बहुत बड़ा स्थान होता है।

वृश्चिक लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – व्यंगप्रिय और आवेशी होते हैं । इस राशि में उत्पन्न स्त्री में पुरुष के गुण होते हैं। ज्योतिष में विश्वास रखने वाले होते हैं। उनका मस्तिष्क सूक्ष्म होता है तथा लोगों पर निष्प्रभावी होते हैं ।

शारीरिक प्रवृत्ति – इस लग्न में उत्पन्न व्यक्ति देखने में सुन्दर होते हैं । उनकी हड्डियां पूर्णत: विकसित होती हैं। उनकी आंखें बड़ी, कद लम्बा, घुंघराले बाल और चेहरा बड़ा होता है। उनका व्यक्तित्व आकर्षक तथा भौंहें सुन्दर और उपदेशात्मक होती हैं ।

सामान्य प्रवृत्ति – वे उदार प्रवृत्ति के होते हैं । वे चंचल मस्तिष्क वाले तथा अधिक भावुकता पसन्द होते हैं। वे कामुकता वाली वस्तुओं को पसन्द नहीं करते किन्तु कामुकता सम्बन्धी आनन्द पर नियन्त्रण रखते हैं। वे उत्तम पत्रकार होते हैं । वे अक्सर अपरिष्कृत और अशिष्ट हो जाते हैं । वे मुकाबला करने में काफी शौकीन होते हैं । वे उद्यमी होते हैं । वे आराम पसन्द होते हैं किन्तु मितव्ययो भी होते हैं ।

यदि वे संगीत सीखें तो उस विद्या में निपुण हो सकते हैं। वे आधुनिक कला, नृत्य और अन्य कलाओं में निपुण हो सकते हैं। उनका अपना मत होता है वे गर्म विचार के होते हैं और उन्हें बवासीर की बीमारी हो सकती है। यद्यपि वे बहुत अच्छे वादी और लेखक होते हैं पर उन्हें अपनी बुद्धि पर कम भरोसा होता है ।

धनु लग्न

शारीरिक प्रवृत्ति – इनके सुन्दर ढंग से सजे हुए होते हैं, प्रसन्न मुद्रा धनु के जातक के शरीर की विशेषता होती है ।

सामान्य प्रवृत्ति – वे कफ प्रवृत्ति के होते हैं। वे काफी पारम्परिक और कारोबार पसन्द होते हैं । वे सदा तत्पर रहते हैं और दकियानूसी विचार के होते हैं। वे हमदर्द प्रिय तथा दूरदर्शी होते हैं। किसी किसी समय परेशान और चिन्तित हो जाते हैं । वे बहुत निष्ठुर और उत्साही होते हैं। ईश्वर से डरते हैं, ईमानदार, नम्र और कपट से मुक्त होते हैं । वे अपने भोजन और पेय पर तथा विपरीत लिंग के साथ सम्बन्धों पर नियन्त्रण रखते हैं। अन्य लोग उन्हें दूसरों के खिलाफ भड़काते हैं । इन्हें उम्र बढ़ने पर फेफड़े से सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे कफ सम्बन्धी दर्द से पीड़ित हो सकते हैं ।

मकर लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – वे जीवन की चिन्ताओं में संयम रखते हैं। हमदर्द, उदार और मानवप्रेमी, अपने प्रयोजनों में प्रबल, रहस्यमय और बदला लेने वाले होते हैं । मकर लग्न के जातक धूर्त और दृढ़ निश्चयी होते हैं ।

शारीरिक प्रवृत्ति – इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति लम्बा, दुबला, लाल और भूरे रंग का और मोह तथा छाती पर घने बाल बाला होता है। सिर बड़ा ओर चेहरा विस्तृत होता है । उसके दांत लम्बे, मुंह वड़ा, लम्बी नाक होती है और झुकने की प्रवृत्ति होती है, शरीर मोटा और मांसल होता है।

सामान्य प्रवृत्ति – वे स्वयं को परिस्थिति के अनुसार बनाने में दक्ष होते हैं। उनके जीवन में बहुत अभिलाषा होती है और धन बचा नहीं सकते हैं। वे प्रदर्शन को पसन्द करते हैं । घरेलू जीवन में वे निपुण होते हैं लेकिन कभी कभी पति/पत्नी से बनती नहीं है । उन्हें अपने इस कष्टप्रद प्रवृत्ति पर नियन्त्रण रखना चाहिए। वे परिश्रमी होते हैं । यदि मंगल अपनी राशि के अतिरिक्त कहीं और हो तो उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है और वे भीरु, उत्तेजित और कमजोर दिमाग के हो जाते हैं । उन्हे गप्पी कहा जा सकता है और उन्हें अपनी जुबान पर कम नियंत्रण रहता है।

कुम्भ लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – कुभ एक दार्शनिक राशि है । इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति महान शिक्षक, लेखक, व्याख्याता होते हैं यदि यह राशि पीड़ित न हो । कुंभ राशि का जातक संचयी होता है। जब उन्हें उत्तेजित किया जाता है तो वे चिड़चिड़े हो जाते हैं। वे उदार. हमदर्द और हमेशा दूसरों की मदद करने वाले होते हैं। वे तेज बुद्धि वाले, अच्छे याददास्त वाले तथा तथ्यों को समझने में सक्षम होते हैं ।

शारीरिक प्रवृत्ति – वे साधारणतया लम्बे, पतले, सुन्दर तथा आकर्षित और मनोहर होते हैं । उनके होंठ लाल और गाल चौड़े होते हैं। उनकी कनपटी और नितंब उभड़े हुए होते हैं। यदि शनि चौथे भाव में हो तो उनकी छाती कमजोर हो होती है और थोड़ी झुकी हुई होती है ।

सामान्य प्रवृत्ति – वे दूसरों को शीघ्र ही मित्र बना लेते हैं । चिड़चिड़े होते हैं, और यदि उत्तेजित कर दिया जाए तो सांढ़ की तरह खूंखार हो जाते हैं किन्तु उनका गुस्सा शीघ्र शान्त हो जाता है। वे लेखक के रूप में उभरते हैं। उनकी बातचीत रुचिकर होती है। वे कभी-कभी डरपोक और भीरु हो जाते हैं। नए श्रोताओं के समक्ष अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करने में उन्हें शर्म आती है । वे ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञ होते हैं और उस क्षेत्र में उनका स्थान होता है।

जब वे युवावस्था में रहते हैं तभी वे साहित्य के क्षेत्र में विश्व में महान बन जाते हैं। यदि ग्रह अनुकूल स्थिति में न हो तो इस राशि में उत्पन्न व्यक्ति को धक्का पहुँचता है और वह अपना सम्मान खो देता है। उनके मानवीय सिद्धान्तों के कारण उन्हें गलत समझा जाता है । पारिवारिक जीवन में उन्हें पर्याप्त सुख नहीं मिलता।

मीन लग्न

मानसिक प्रवृत्ति – मीन राशि में उत्पन्न व्यक्ति जिद्दी, आध्यात्मिक, ग्रहणशील, अत्यधिक धार्मिक, संयमी, धर्मान्ध और ईश्वर से डरने वाले होते हैं । शारीरिक प्रवृत्ति वे साफ मध्यम ऊँचाई, सांवला रंग, मछली की आंख जैसी आखों और मोटे शरीर वाले होते हैं ।

सामान्य प्रवृत्ति – वे दकियानूसी सिद्धान्तों का आदर करते हैं और हर बातें भूल सकते हैं किन्तु ददियानूसी बातें नहीं भूल सकते । वे बहुत संजीदा रहते हैं और किसी बात पर समय से पहले निर्णय ले लेते हैं। वे ईश्वर से डरने वाले होते है और धार्मिक परम्परा तथा प्रथाओं का सख्ती से पालन करते हैं । वे भीर, जिद्दी तथा दूसरों पर अधिकार जताने में महत्वाकांक्षी होते हैं। वे अपनी महत्वाकांक्षाओं को समझ नहीं पाते। बेचैन रहते हैं और इतिहास, पोरातनिक बातचीत और धर्मग्रन्थों के शौकीन होते हैं ।

मानसिक प्रवृत्ति – धनु लग्न में उत्पन्न व्यक्ति दर्शनशास्त्र और ज्योतिष के अध्ययन में रुचि रखता है । इन विषयों में उनका अपना अधिकार होता है । वे कुछ आवेशी तथा सामान्यतः चंचल और उद्यमी होते हैं ।

शारीरिक प्रवृत्ति – इस राशि में उत्पन्न व्यक्तियों का शरीर स्थूल होता है । उनकी आंखें बादामी और बाल भूरे होते हैं। वे देखने में सुन्दर होते हैं । उनके होता है । वे अपने व्यवहार में न्याय परायण होते हैं और सत्य का पालन करते है इन सबके बावजूद उनमें आत्मविश्वास का अभाव होता है ।


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