कुंडली के दसवें भाव का फलादेश

दसवें भाव से जीविका, व्यवसाय, सांसारिक सम्मान, विदेश यात्रा, आत्म सम्मान, ज्ञान और प्रतिष्ठा तथा जीविका के साधन का विचार किया जाता है।

किसी कुण्डली के विश्लेषण में सबसे कठिन और अति महत्वपूर्ण व्यवसाय या जीविका का अवधारण है। वास्तव में आजकल उपव्यवसायों की संख्या इतनी बढ़ गई है और ये एक दूसरे से इतने भिन्न हैं कि व्यवसाय के वास्तविक स्वरूप को सुनिश्चित करना लगभग असंभव सा हो गया है।

विभिन्न भावों में द्शमाधिपति का फल

1. प्रथम भाव में – जब द्शमाधिपति लग्न में स्थित हो तो जातक अध्यवसाय से जीवन में उन्नति करता है। वह स्वयं के रोजगार में होगा या स्वतन्त्र व्यवसाय करेगा । जब लग्नाधिपति और द्शमाधिपति प्रथम भाव में युक्त हों तो जातक काफी प्रसिद्ध बनता है और वह अपने कार्यक्षेत्र में अग्रगामी होता है। वह जन-संस्थान की स्थापना करता है और अपने आप को सामाजिक कार्यों में व्यस्त रखता है।

2. द्वितीय भाव में – यदि द्शमाधिपति दूसरे भाव में हो तो जातक भाग्यशाली होता है। वह जीवन में उन्नति करता है और काफी धन अर्जित करता है। वह अपने पारिवारिक व्यापार में व्यस्त रहता है और उसे विकसित करता है। यदि दसम भाव पर पापग्रहों का प्रभाव हो तो उसे हानि होगी और पारिवारिक कारोबार को समाप्त होने के लिए जिम्मेदार होगा। वह खानपान और रेस्तरां के कारोबार में सफलता प्राप्त करेगा ।

3. तृतीय भाव में – जातक निरन्तर कम दूरी की यात्राएँ करेगा। यदि दशमाधिपति उत्तम स्थिति में हो तो वह उच्चकोटि का व्याख्याता या लेखक होगा। उसकी वृत्ति की जन्मति में उसके भाई कुछ सीमा तक सहायक होंगे।

यदि द्शमाधिपति नवांश लग्न से ६, ८ वा १२ वें भाव में हो अथवा तीसरे भाव में शत्रु के नक्षत्र में हो तो जीवन में जातक की प्रगति धीमी होती है और बहुत सी रुकावटें आती हैं। यदि तृतीयेश भी पीड़ित हो तो भाइयों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण जातक की जीविका में बाधाएं आएँगी।

4. चतुर्थ भाव में – जातक भाग्यशाली होगा और विभिन्न विषयों का विद्वान होगा । वह अपने ज्ञान और उदारता दोनों के लिए प्रसिद्ध होगा। यदि दश्माधिपति बली हो तो जातक जहाँ कहीं भी जाता है, उसे आदर मिलता है। और उसे राजा की कृपा प्राप्त होती है। वह कृषि कार्य कर सकता है या अचल सम्पत्तियों में व्यापार कर सकता है।

यदि चतुर्थेश, नवमेश और दशमेश शुभ स्थिति में और एक दूसरे से सम्बन्धित हों तो जातक राष्ट्रपति या सरकार के प्रधान के रूप में राजनैतिक शक्ति प्राप्त करता है।

यदि द्शमाधिपति दबा हुआ हो, अस्त हो, शत्रु राशि में हो या पापग्रहों से पीड़ित हो तो जातक अपनी भूमि गँवा देता है और पराधीनता का जीवन बिताने पर बाध्य हो जाता है।

5. पंचम भाव में – जातक दलाल के रूप में उन्नति करता है और सट्टा तथा इसी प्रकार का कारोबार करता है। यदि पंचम भाव में द्शमाधिपति के साथ शुभ ग्रह युक्त हों तो जातक साधारण और पवित्र जीवन व्यतीत करता है तथा प्रार्थना तथा पवित्र कामों में लगा रहता है। यह किसी अनाथालय या सुधारालय का प्रधान बन सकता है।

6. षष्ठ भाव में – जातक न्याय, जेल या अस्पताल से सम्बन्धित व्यवसाय करेगा। यदि दरामाधिपति पर शनि की दृष्टि हो तो उसे कम पैसे पर जीवन भर काम करना होगा और उस काम में कोई भविष्य नहीं होगा।

यदि द्शमाधिपति पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो उसे उच्चशक्ति प्राप्त पद प्राप्त होता है और वह अपने उच्च चरित्र के लिए प्रसिद्ध होता है।

यदि दशमाधिपति के साथ राहू या पीड़ित ग्रह हों तो वह अपने जीवन में अपमानित होता है। वह आपराधिक काम में फंस सकता है और जेल जा सकता है ।

7. सप्तम भाव में – जब दसभाधिपति सप्तम भाव में हो तो पत्नी प्रवीण होती है और उसके कार्य में सहायता करती है। वह राजनयिक कार्यों से विदेश की यात्रा करेगा । वह अपनी वाक्पटुता और लक्ष्य प्राप्ति में कुशलता के लिए प्रसिद्ध होगा । उसे भागीदारी और सहकारी उद्यम से लाभ होगा। यदि द्शमाधिपति पर पापग्रहों का प्रभाव हो तो जातक अपनी लैंगिक आदतों में नीच होगा हर प्रकार के कदाचार में रत रहेगा।

8. अष्टम भाव में – जातक के जीवन में अनेक परिवर्तन आएँगे। यदि द्शमाधिपति बली हो तो वह अपने क्षेत्र में उच्च पद पर होगा किन्तु मात्र थोड़े समय के लिए। यदि दशमाधिपति पर पापग्रहों का प्रभाव हो तो जातक में अपराध के गुण होते हैं और वह अपराध करता है।

यदि अष्टम भाव में दृष्टि या युति से दशमाधिपति पर वृहस्पति का प्रभाव हो तो यह रहस्य या आध्यात्मिक शिक्षक बनेगा ।

9. नवम भाव में – यदि द्शमाधिपति नवम भाव में हो तो जातक आध्यात्मिक रूप से निष्ठावान होता है। यदि वृहस्पति की दृष्टि हो तो जातक अध्यात्म के क्षेत्र में लोगों का पथ प्रदर्शक होगा।

यदि द्शमाधिपति पर शुभ ग्रहों और पापग्रहों दोनों की दृष्टि हो तो जातक साधारणतः भाग्यशाली और सम्पन्न होगा। वह पैत्रिक व्यवसाय करता है या वह उपदेशक, शिक्षक या कल्याण का कार्य करता है। उसके ऊपर पिता का बहुत प्रभाव रहता है। वह एक आज्ञाकारी पुत्र होता है और धर्मार्थ कार्य करता है।

10. दसम भाव में – यदि द्शमाधिपति दसम भाव में बली हो तो जातक अपने व्यवसाय में काफी सफल रहता है और उसे आदर तथा सम्मान मिलता है।

यदि स्वामी कमजोर और पीड़ित हो तो उसे सम्मान नहीं मिलेगा और वह अपने काम के लिए जी हुजूरी में लगा रहता है। वह जीवन भर दूसरों पर निर्भर रहेगा। वह अस्थिर चित्त वाला होगा।

यदि द्शमाधिपति नवांश में 6, 8, 12वें भाव में हो तो जातक का जीवन साधारण रहेगा।

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यदि दशमाधिपति के साथ दसम भाव में तीन अन्य ग्रह युत हों तो जातक संन्यासी बन जाता है।

11. एकादश भाव में – जातक काफी धन अर्जित करता है। वह सभी प्रकार से भाग्यशाली होता है। वह सराहनीय कार्य करता है। वह सैकड़ों लोगों को रोजगार देता है और काफी सम्मान प्राप्त करता है। इसके अनेक मित्र होते हैं।

यदि एकादश भाव पीड़ित हो तो उसके मित्र शत्रु बन जाते हैं और उसके आर्थिक संकट और चिन्ता के कारण वन जाते हैं।

12. द्वादश भाव में – यदि द्शमाधिपति १२ वें भाव में हो तो जातक को काफी दूर जाकर काम करना होगा उसे जीवन में आराम नहीं मिलेगा और काफी कठिनाइयों का सामना करना होगा।

यदि ये शुभ स्थिति में हों तो जातक अध्यात्म की खोज में निकल पड़ता है। वह अपने परिवार से अगल हो जाता है और घूमता रहता है तथा उसे सफलता प्राप्त नहीं होती ।

यदि द्शमाधिपति पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो वह तस्करी तथा अन्य घृणास्पद कार्य करेगा। यदि द्शमाधिपति पर राहु का प्रभाव हो तो जातक धोखेबाज और अपराधी होता है। वह अपने परिवार तथा सम्बन्धियों के लिए दुख का कारण बनता है।

अन्य महत्वपूर्ण निर्णय

व्यवसाय पर निर्णय करने से पूर्व क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा और लग्न के बलाबल का सावधानी पूर्वक अध्ययन करके जातक की मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक क्षमता को सुनिश्चित कर लेना आवश्यक होता है। बुध की स्थिति भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। चूंकि बुध ग्रह बुद्धि को नियन्त्रित करता है अतः किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति के माप के लिए इसकी शुभ स्थिति समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।

जब चन्द्रमा या बुध पर अनेक बुरे प्रभाव हों विशेषकर राहु और शनि के, तो जातक में मानसिक बल का अभाव होता है और उसे नाजुक स्थिति का सामना करना पड़ता है और यह उत्तरदायित्व वाले व्यवसाय के लिये अनुपयुक्त होगा और उसमें नाजुक स्थितियों का सामना करने की क्षमता नहीं होगी।

कुण्डली में सबसे अधिक बळी ग्रह का भी व्यवसाय पर प्रभाव होता है।

दसवें भाव में ग्रह

1. सूर्य – जातक को सभी कामों में सफलता मिलती है। वह मजबूत और खुश रहेगा। उसके पुत्र होंगे, सवारी होगी, वह प्रसिद्ध होगा, तीव्र बुद्धि वाला होगा, उसके पास धन और शक्ति होगी। वह नौकरी करेगा। उसे पैतृक सम्पति प्राप्त होगी। वह संगीत का शौकीन होगा और उसका अपना व्यक्तिगत आकर्षण होगा । यदि मंगल सूर्य से युत हो तो जातक नशे आदि का आदी होता है।

यदि सूर्य के साथ बुध हो तो वह व्यक्ति विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करता है। वह स्त्रियों और आभूषणों का शौकीन होगा। १० वें भाव में सूर्य के साथ शुक्र हो तो जातक को अमीर पत्नी मिलेगी। सूर्य के साथ शनि युत होने पर दुख और उदासी रहती है।

2. चन्द्रमा – जातक धर्मपरायण, अमीर तीव्र बुद्धि वाला और बहादुर होगा। वह अपने सभी प्रयासों में सफल होगा। वह जेवर और स्त्रियां प्राप्त करेगा और वह कला में कुशल होगा। वह मदद करने वाला और सदाचारी होगा।

चन्द्रमा के साथ बृहस्पति हो तो जातक प्राचीन विषयों में विद्वान और ज्योतिष में निपुण होता है । यदि चन्द्रमा पर शनि की दृष्टि हो तो जातक दार्शनिक होगा और मुद्रण तथा पुस्तकों को बेचकर धन अर्जित करेगा। उसके अनेक मित्र होंगे । वह धार्मिक संस्थाओं का न्यासी होगा और आराम का जीवन व्यतीत करेगा।

3. मंगल – वह एक कठोर राजा होगा वह अपनी प्रशंसा कराने का शौकीन होगा और शासन करने में साहसी कदम उठाएगा। धन अर्जित करेगा। यदि मंगल के साथ बुध युक्त हो तो जातक एक कुशल वैज्ञानिक या राजा द्वारा सुरक्षा प्राप्त तकनीशियन होगा।

यदि मंगल के साथ बृहस्पति हो तो जातक निम्न वर्ग के लोगों का नेता होगा। यदि शुक्र के साथ हो तो वह विदेश में व्यापार करेगा। यदि १० वें भाव में मंगल और शनि युत हों तो वह साहसी होगा किन्तु उसे कोई संतान नहीं होगा ।

4. बुध – वह प्रसन्न और सिद्धान्तवादी होगा। वह अनेक विषयों में विद्वान होगा । और अतिरिक्त ज्ञान तथा प्रसिद्धि प्राप्त करने में प्रयत्नशील रहेगा। यह अपने सभी प्रयासों में सफल होगा। उसकी दृष्टि कमजोर होगी परन्तु खगोलशास्त्र तथा गणित का काफी ज्ञान होगा।

यदि बुध के साथ शुक्र हो तो जातक की पत्नी सुन्दर होगी और उसके पास काफी धन होगा। यदि बृहस्पति हो तो वह अप्रसन्न रहेगा और उसे कोई बच्चा नहीं होगा किन्तु सरकार के प्रधान लोगों के बीच रहेगा। शनि और बुध के युत होने पर जातक अपने कार्य में कफी मेहनत करेगा अर्थात् वह प्रतिलिपिक या प्रूफ रीडर होगा। और आर्थिक संकट में रहेगा।

5. बृहस्पति  – जातक सरकार में उच्च अधिकारी होगा। धनी, सदाचारी, अपने आध्यात्मिक या धार्मिक जीवन में अटल, चतुर और प्रसन्न होगा। वह अति सिद्धावादी होगा। यदि १० वें भाव में बृहस्पति और शुक्र युत हों तो जातक सरकार द्वारा पसन्द किया जाता है और उसे ब्राह्मण (विद्वान व्यक्ति) की सुरक्षा का कार्य सौपा जाता है। यदि वृति और राहु युक्त हों तो वह दुष्ट प्रकृति का होगा और दूसरों के लिए कष्ट का कारण बनेगा। यदि बृहस्पति पर मंगल की दृष्टि हो तो जातक अनुसंधान संस्था, शैक्षिक संस्था का प्रधान बनता है।

6. शुक्र – जातक मकान और भवनों से आय अर्जित करता है। वह अति प्रभावी होगा और उसके लिए अनेक स्त्रियों कार्य करेंगी। वह सामाजिक और प्रसिद्ध होगा। यदि शुक्र और शनि युत हों तो जातक श्रृंगार की वस्तुओं और महिलाओं के प्रयोग की वस्तुओं से लाभ कमाएगा। उसके भीतर सहनशक्ति होगी और वह एक कुशल व्यापारी होगा। उसकी शिक्षा में रुकावट आएगी।

7. शनि – जातक शासक या मंत्री बनता है। वह कृषक, बहादुर, घनी और प्रसिद्ध होगा। वह स्वभाव से उत्तम होगा और दलितों के लिए कार्य करेगा। यह न्यायप्रिय होगा और न्यायाधीश की क्षमता में कार्य करेगा। जातक पवित्र नदियों और स्थलों पर जाता है और बाद में संन्यासी बन जाता है। उसके जीवन में अचानक उत्थान और पतन आता है। यदि शनि अशुभ नवांश में अष्टमाधिपति से युक्त हो तो जातक अपने अधिकारी से आतंकित रहता है।

8. राहु – विधवाओं के प्रति आकर्षण की प्रवृत्ति होगी। वह एक कुशल कलाकार और कविता तथा साहित्य में रुचि रखने वाला होगा। वह व्यापक यात्रा करता है और विद्वान होता है। वह प्रसिद्ध होगा और कारोवार करेगा। उसके बच्चे कम होंगे । वह साहसी और कुछ-कुछ दुस्साहसी होगा तथा अनेक पाप करेगा ।

9. केतु – जातक बली, बहादुर और विख्यात होगा। वह नीच काम करेगा, और आचरण से अपवित्र होगा। उसे अपने कामों में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। वह बहुत चतुर होगा। यदि शुभ स्थिति में हो तो जातक प्रसन्न और धार्मिक व्यक्ति होगा । धर्म ग्रन्थों को अच्छी प्रकार पड़ेगा और तरह धार्मिक स्थलों तथा पवित्र नदियों की यात्रा करेगा।


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