कुंडली के सातवें भाव का फलादेश

सप्तम भाव मुख्यतः विवाह, पत्नी या पति और विवाहित सुख से सम्बन्धित होता है। सप्तम भाव का विश्लेषण करने में निम्नलिखित तीन बातों पर विधिवत् विचार करना चाहिए ।

  • सप्तम भाव
  • सप्तमाधिपति
  • कारक, जो इस मामले में शुक्र है।
  • सप्तम भाव में स्थित ग्रह और सप्तमाधिपति से सम्बन्धित ग्रह।

विभिन्न भावों में सप्तमाधिपति का फल

1. प्रथम भाव में – जातक किसी ऐसे व्यक्ति से शादी कर सकता है जिसे वह बचपन से जानता हो अथवा जो उसी मकान में बड़ा हुआ हो। जातक की पत्नी या पति स्थिर और परिपक्व होगा। वह तेज बुद्धिवाला होगा और उसमें सभी वस्तुओं की जाँच करने की क्षमता होगी।

सप्तमाधिपति पर यदि बुरे प्रभाव हों तो जातक निरन्तर यात्रा पर रह सकता है। यदि सप्तमेश और शुक्र दोनों ही पीड़ित हो ता जातक कामुक हो सकता है और विपरीत लिंग के साथ सम्बन्ध का इच्छुक होगा।

2. द्वितीय भाव में – जातक स्त्रियों से या विवाह के माध्यम से धन प्राप्त करेगा। यदि पीड़ित हो तो जातक अपनी स्त्री सहित स्त्रियों का व्यापार जैसे घृणित साधनों से धन अर्जित कर सकता है। वह श्राद्ध के अवसर पर दिया गया भोजन करेगा और इस प्रकार का भोजन प्राप्त करने के लिए घूमता रहेगा ।

यदि दूसरे भाव में द्विस्वभाव राशि हो और बुरे प्रभाव में हो तो एक से अधिक विवाह की संभावना होती है। यदि मारक दशा चल रही हों तो जातक की मृत्यु सप्तमाधिपति की दशा के दौरान होगी। जातक एक भ्रमित मस्तिष्क वाला होगा और उसका झुकाव हमेशा वासना की ओर रहता है।

3. तृतीय भाव में – इस स्थिति में भाई भाग्यशाली होते हैं और वे विदेश में निवास करते हैं, यदि बुरे प्रभाव में हो तो वह भाई की विवाहित पत्नी या बहन के विवाहित पति के साथ व्यभिचार में रत रहेगा। यदि बुरे प्रभाव हों तो भाई बहनों का भाग्य बिगड़ता है। लड़कियां जीवित रहती हैं।

4. चौथे भाव में – विवाहित पति/पत्नी, भाग्यशाली और प्रसन्न रहते हैं, उनके बच्चे अधिक होते हैं तथा उन्हें हर प्रकार का सुख प्राप्त होता है। जातक उच्च शैक्षिक योग्यता प्राप्त करता है और उसके पास अनेक सवारियाँ होती हैं।

यदि बुरे प्रभाव में हो तो अपरिपक्व और नीच पति/पत्नी के कारण पारिवारिक सद्भावना नष्ट हो सकती है। जातक को अपनी सवारियों के कारण अनगिनत समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

यदि छायाग्रहों और अन्य पापग्रहों द्वारा बुरी तरह प्रभावित हो तो जातक की पत्नी के चरित्र पर संदेह किया जा सकता है ।

5. पंचम भाव में – कम आयु में शादी, पति/पत्नी सम्पन्न परिवार से होगी। पत्नी या पति परिपक्व होंगें और जातक के लिए लाभकारी होगें।

यदि सप्तमाधिपति कमजोर हो तो कोई बच्चा नहीं भी हो सकता है। यदि बुरे ग्रहों के प्रभाव में हो तो पत्नी की चरित्र हीनता से जातक को सन्तान होगी।

यदि सप्तमाधिपति पर बुरे प्रभाव और शुभ प्रभाव दोनों ही हों तो जातक को केवल लड़कियाँ होंगी।

6. षष्ठ भाव में – जातक की दो शादियां हो सकती है और दोनों जीवित रहेंगी। जातक अपनी चचेरी बहन से शादी कर सकता है।

यदि उसपर बुरे प्रभाव हों और कारक शुक्र भी बुरी स्थिति में हो तो जातक नपुंसकता और अन्य बीमारियों का शिकार होगा । जातक की पत्नी रोगिणी होगी और स्वभाव से ईर्ष्या होगी तथा जातक को विवाह के सुख से बंचित रखेगी।

यदि शुक्र उत्तम स्थिति में हो और सप्तमाधिपति पीड़ित हो तो जातक कुछ नासमझी के कामों के कारण विवाहित पति/पत्नी को छोड़ सकता है।

7. सप्तम भाव में – यदि उत्तम स्थिति में हो तो जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होगा। स्त्रियाँ उसके आगे पीछे घूमेंगी और उससे मित्रता करने के लिए इच्छुक रहेंगी। पत्नी या पति न्यायप्रिय और सम्मानित व्यक्ति होगा और वे सम्मानित तथा सामाजिक हैसियत वाले परिवार से होंगे।

यदि सप्तमेश कमजोर और पीडित हो तो विवाह तथा मित्रों से वंचित रखता है और विवाह से हानि होती है।

8. अष्टम भाव में – यदि उत्तम स्थिति में हो तो किसी संबन्धी से शादी होती है या पति/पत्नी धनी हो सकते हैं।

यदि बुरे प्रभाव हों तो पति/पत्नी की शीघ्र मृत्यु हो जाती है जबकि जातक की मृत्यु दूर देश में होती है। ऐसी स्थिति में बीमार या खराब मिजाज की पत्नी/पति मिलता है जिससे तलाक हो जाता है।

9. नवम भाव में – यदि बली हो तो पिता विदेश में रहते हैं जबकि जातक विदेशी भूमि पर सम्पन्न होता है उसे सुसंस्कृत पत्नी मिलती है जो उसे धार्मिक जीवन बीताने में समर्थ बनाती है।

यदि उसपर बुरे प्रभाव हों तो पिता की शीघ्र मृत्यु हो सकती है। विवाहित पति/पत्नी उसे धार्मिक जीवन से दूर ला सकते हैं और वह अपने धन का नाश कर सकता है तथा आर्थिक संकट में पड़ सकता है।

10. दसम भाव में जातक विदेश में व्यवसाय में सफल होगा या उसे निरन्तर यात्रा करनी पड़ सकती है। जातक को समर्पित और आज्ञाकारी पति/पत्नी मिलेगी, पत्नी भी रोजगार में होगी और जातक की आय में सहयोग देगी। अथवा वह जातक की उन्नति में सहायता करेगी।

यदि बुरे प्रभाव हों तो पत्नी घन लोलुप, कामी तथा महत्वाकांक्षी होगी किन्तु उसमें क्षमता कम होगी।

11. एकादश भाव में – एक से अधिक विवाह हो सकता है या जातक स्त्रियों से सम्बन्ध रख सकता है। यदि यह शुभ स्थिति में हो तो पत्नी धनी परिवार से होगी और अपने साथ काफी धन लाएगी।

यदि बुरे प्रभाव में हो तो जातक एक से अधिक शादियाँ कर सकता है परन्तु एक पत्नी जातक से अधिक समय तक जीवित रहेगी।

12. द्वादश भाव में – जातक के जीवन में एक से अधिक विवाह सम्पन्न होगा । वह दूसरी बार सगोत्रीय शादी कर सकता है जब कि पहली पत्नी जीवित रहेगी। अथवा यदि पीड़ित हो तो शादी के तुरन्त बाद पति या पत्नी की मृत्यु हो सकती है या वे अलग हो सकते हैं और दूसरी शादी नहीं भी हो सकती है। यात्रा के दौरान या विदेश में मृत्यु हो सकती है।

यदि कारक और सप्तमाधिपति दोनों ही बुरे प्रभाव में हों तो जातक केवल स्त्रियों का सपना देख सकता है किन्तु कभी शादी नहीं करेगा । जातक की पत्नी निर्धन परिवार से होगी। वह आर्थिक तंगी में रहेगा और साधारणतः गरीब होगा ।

यदि समाधिपति विभिन्न भावों में स्थित हो तो ये फल होते हैं। किन्तु ग्रहों के बल और कमजोरी का निर्धारण करने के बाद समस्त कुण्डली पर विचार किए बिना इन्हें कुण्डली पर ज्यों का त्यों लागू नहीं करना चाहिए ।

महत्वपूर्ण योग

नीचे सातवें भाव पर महत्वपूर्ण योग दिए जा रहे है जो मानक और अधिकृत पुस्तकों से लिए गए हैं–

1. यदि लग्न या चन्द्रमा से सातवें भाव में नवमेश या राशि स्वामी या अन्य कारक ग्रह स्थित हो या उनकी दृष्टि हो तो शादी से सुख मिलेगा और पत्नी स्नेहमयी और भाग्यशाली स्त्री होगी।

2. यदि द्वितीयेश, सप्तमेश और द्वादशेश केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा बृहस्पति से दृष्ट हों तो सौभाग्यशाली विवाह और उत्पादनशील पत्नी सुनिश्चित करता है।

3. यदि सप्तमेश से दूसरे सातवें और ग्यारहवें भाव में कारक ग्रह हों तो पति पत्नी को सभी प्रकार का सुख मिलेगा और बच्चे भाग्यशाली होंगे।

4. यदि मंगल और शनि मकर राशि में सातवें भाव में हों तो पत्नी सती, सुन्दर और भाग्यशाली होगी।

5. यदि सप्तमेश और शुक्र सम राशि में हों, यदि सातवां भाव भी सम राशि हो, और पंचमेश तथा सप्तमेश सूर्य के सन्निकट न हों या अन्य प्रकार से कमजोर न हों तो उस व्यक्ति को उत्तम पत्नी और बच्चे मिलेंगे ।

6. यदि बृहस्पति सप्तम भाव में हो तो जातक अपनी पत्नी का भक्त होगा।

7. यदि शुक से ४, ८ और १२ वें भाव में कारक ग्रह हो या शुक्र मारक ग्रहों के बीच घेरे में हो तो विवाह के बाद पत्नी की शीघ्र मृत्यु हो जाएगी।

8. यदि शुक्र से सातवें भाव में मारक ग्रह हों तो विवाह सुखी नहीं होगा। वृषभ लग्न वालों के सप्तम भाव में शुक्र होने पर पत्नी की मृत्यु हो जाती है।

9. यदि सप्तमेश पंचम भाव में हो या पंचमेश सप्तम भाव में हो तो जातक विवाह नहीं कर सकता है या यदि वह विवाह करता है तो बच्चे नहीं होंगे।

10. यदि पुरुष के मामले में दूसरे और सातवें भाव में तथा स्त्री के मामले में सातवें और आठवें भाव में मारक ग्रह स्थित हों या उनपर मारक ग्रह की दृष्टि हो तो पति या पत्नी की मृत्यु हो जाती है ।

11. यदि पंचमेश या अष्टमेश सातवें भाव में हो तो पति या पत्नी की मृत्यु हो जाती है ।

12. लग्न, बारहवें और सातवें भाव में मारक ग्रह हो और पंचम भाव में क्षीण चन्द्रमा हो तो शादी नहीं होती या बच्चे नहीं होंगे।

13. यदि चन्द्रमा और शुक्र, मंगल और शनि के विपरीत हों तो शादी नहीं होती ।

14. स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव में चन्द्रमा और शनि स्थित होने पर दूसरी शादी का संकेत मिलता है जबकि पुरुष की कुण्डली में ऐसी स्थिति में शादी या संतति नहीं होती।

15. लग्न से 2, 7 और 8 वें भाव में मारक ग्रह होने पर विवाहिता का देहान्त हो जाता है ।

16. दूसरे भाव में सूर्य और राहु स्थित होने पर स्त्री के माध्यम ने धन की हानि होती है।

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17. सातवें भाव में वृषभ में बुध यॉ मकर में वृहस्पति या मीन में शनि-मंगल विवाहिता के जीवन के लिए हानिकर है।

18. लग्न में बुध और केतु हो तो पत्नी बीमार रहेगी। सातवें भाव में शनि और बुध स्थित हों तो जीवन साथी के लिए वैधव्य या विधुर का संकेत मिलता है।

19. यदि सातवें भाव में चन्द्रमा बली हो तो उत्तम पत्नी होगी। सातवें भाव में केतु स्थित होने पर पत्नी दुष्ट होती है। जबकि राहु की स्थिति से विजातीय स्त्री मिलती है।

20. यदि 6, 8 और 9 वे भाव में मारक ग्रह हों और मारक ग्रह से दृष्ट हों तो जातक की पत्नी व्यचारिणी होगी ।

21. यदि कमजोर और पीड़ित शुक्र सातवें भाव में हो तो पत्नी बांझ हो सकती है या पति नपुंसक हो सकता है।

22. यदि शनि जलीय तत्त्व राशि में छठे और बारहवें भाव में हो और शुभ दृष्टि से वंचित हो तो जातक हिजड़ा होगा ।

निम्नलिखित ग्रह स्थिति में जातक नपुंसक होता है-

  • शनि छठे या बारहवें भाव में दबा हुआ हो ।
  • शनि शुक्र से छठे या आठवें भाव में हो।
  • चन्द्रमा सम राशि में और बुध विषम राशि में हो तथा दोनों पर मंगल की दृष्टि हो ।
  • यदि लग्न, शुक्र और चन्द्रमा विषम नवांश में हों ।
  • यदि सप्तमेश और शुक्र छठें भाव में हों ।

23. यदि सप्तमेश और शुक्र, राहु या केतु के साथ हों और मारक ग्रह से दृष्ट हों तो जातक या उसकी पत्नी व्यभिचारी होगी।

24. यदि सातवें भाव में शुक्र पर शनि या मंगल की दृष्टि हो तो जातक व्यभिचारी होगा।

25. यदि शनि, चन्द्रमा और मंगल सप्तम भाव में स्थित हों तो जातक और उसकी पत्नी दोनों ही अनैतिक होंगे।

26. यदि द्वितीयेश, सप्तमेश और दसमेश सातवें भाव में हों तो जातक चरित्रहीन होगा ।

27. यदि चौथे भाव में शनि पीड़ित हो तो जातक अनाचारी होगा।

सातवें भाव में ग्रह

1. सूर्य – जातक का रंग गोरा होगा और सिर पर बाल कम होंगे। उसके मित्र कम होंगे और लोगों के साथ मित्रता करने में उसे कठिनाई होगी। शादी विलम्ब से होगी और उसमें कष्ट होगा। यात्रा का शौकीन होगा और नैतिक रूप से गिरा हुआ होगा। वह विदेशी वस्तुओं को पसन्द करेगा। उसकी पत्नी का चरित्र संदिग्ध होगा और जातक को स्त्रियों के माध्यम से हानि और बदनामी उठानी पड़ेगी। उसे सरकार की अप्रसन्नता उठानी होगी और उसका अपमान होगा। उसकी आकृति बिगड़ जायेगी।

2. चन्द्रमा – जातक कामुक होगा और आसानी से ईर्ष्या करने लगेगा। जातक की युवावस्था में मां की मृत्यु हो सकती है। पत्नी देखने में सुन्दर होगी किन्तु जातक अन्य स्त्रियों को चाहेगा। संकीर्ण दिमाग का होगा किन्तु समाज में प्रिय होगा । वह जीवन्त होगा और जीवन में सफल रहेगा। यदि चन्द्रमा उच्च का हो या बली हो तो जातक अच्छे परिवार से होता है। यदि चन्द्र क्षीण हो तो वह सर्वदा शत्रुओं के साथ झगड़ा करता रहेगा।

3. मंगल – जातक पर अपनी पत्नी का शासन रहेगा और वह स्त्रियों के साथ नम्र रहेगा। विवाहित जीवन में झगडा और तनाव रहेगा तथा उसकी दो पत्नियां हो सकती हैं। जावक क्रूर होगा और सट्टा में रुचि रखेगा। यह तेज बुद्धिवाला, अव्यावहारिक, हठी, चिड़चिड़ा और असफल होगा।

4. बुध – वह सदाचारी और मिलनसार व्यक्ति होगा। वह उत्तम पोशाक पहनेगा उसे कानून का अगाध ज्ञान होगा। यह कारोबार और व्यापार में कुशल होगा उसमें लिखने की क्षमता होगी तथा जीवन के आरम्भ में इसके माध्यम से सफल रहेगा। अमीर स्त्री से शादी होगी गणित, ज्योतिष और खगोल शास्त्र में विद्वान्, धार्मिक तथा पवित्र विचार वाला होगा। राजनयिक होगा । किन्तु बुध पीड़ित हो तो जातक दुष्ट और मक्कार होगा।

5. वृहस्पति – राजनयिक और कोमल हृदय वाला होगा। जातक की पत्नी पवित्र, सुन्दर और सती होगी। उसकी शिक्षा अच्छी होगी और शादी से लाभ होगा। वह दूसरों के मनोभाव के प्रति संवेदनशील होगा उसका मस्तिष्क चिन्तनशील होगा और यह एक उत्तम किसान होगा। वह दूरस्थ धर्मस्थलों पर जाएगा तथा उसमें अपने पिता से बढ़ चढ़ के गुण होंगे। जातक के उत्तम पुत्र होंगे।

6. शुक्र – झगड़ालू, विषयासक्त और कामुक । जातक की खराब आदतें होंगी विवाहित जीवन सुखी रहेगा तथा उस की पत्नी उसकी भक्त होगी। वह आनन्द और पेय का शौकीन तथा प्रीतिकर एवं आकर्षक आचार वाला होता है। उसका व्यक्तित्व चुंबकीय है। रोग या आधिक्य के कारण उसे पुरुषत्व की हानि का खतरा रहता है। वह विपरीत लिंग वालों के साथ भागीदारी में सफल रहेगा ।

7. शनि – जातक अपनी पत्नी के नियन्त्रण में रहेगा, पत्नी कुरूप या कुबड़ी होगी। उसकी एक से अधिक शादी होगी या विधवा, तलाक शुदा या अधिक उम्र वाले के साथ शादी होगी, वह राजनयिक और उद्यमी होगा। उसका आवास विदेश में होगा स्थिर विवाह करेगा और राजनीति में सफलता मिलेगी। उसे विदेश में सम्मान और विशिष्टता प्राप्त होगी, वह उदरशूल और बहरेपन से पीड़ित रहेगा।

8. राहु – जातक परिवार के लिए अप्रसिद्धि लाएगा यदि वह स्त्री है। वह अपारम्परिक तथा अपधम होगा। उसे विजातीय या विदेशी स्त्रियों से प्रेम होगा । उसकी पत्नी गर्भाशय के रोग से पीड़ित रहेगी। वह अच्छा भोजन करता है और उसकी आदतें आराम पसन्द होती हैं तथा मधुमेह, प्रेतों और अप्राकृतिक वस्तुओं से पीड़ित रहता है।

9. केतु – दुष्ट प्रकृति की पत्नी के साथ शादी करके जातक सुखी नहीं रहता है। वह कामुक, पापी होगा और विधवाओं के प्रति आसक्त रहेगा। उसकी पत्नी बीमार रहती है। जातक के पेट या यदि स्त्री है तो गर्भाशय में केन्सर होता है । उसकी बदनामी होगी और पुरुषत्व की हानि होगी । सातवें भाव पर दृष्टि या युति द्वारा इन परिणामों में संशोधन किया जाना चाहिए है।

सातवें भाव को नियन्त्रित करने वाले तथ्य निम्नलिखित हैं-

(क) अधिपति

(ख) सातवें भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रह

(ग) सातवें भाव में स्थित ग्रह

(घ) सप्तमेश पर दृष्टि डालने वाले ग्रह

(ङ) सप्तमेश के साथ युत ग्रह

(च) चन्द्रमा से सप्तमेश और

(छ) सातवें भाव का कारक ।

ये तथ्य दशा नाथ, भुक्तिनाथ या प्रत्यन्तर अथवा सूक्ष्म दशा स्वामी के रूप में सातवें भाव को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

सातवें भाव को प्रभावित करने में सक्षम ग्रहों के दशा काल में, भुक्ति काल में सातवें भाव से संबन्धित फल उत्तम और अधिक गहन होते हैं

जहाँ सप्तमेश शक्तिशाली योग में हो वहाँ वह अपनी दशा या मुक्ति में सातवें भाव से सम्बन्धित योग का फल देने में सक्षम है।

यदि सप्तम भाव बुरी तरह पीड़ित हो सप्तमेश अपनी दशा या भुक्ति में शादी को नष्ट कर सकता है या इसे काफी दयनीय बना सकता है। यदि बली हो तो इससे विवाहित जीवन सफल, विशिष्ट और सुखी हो सकते हैं ।

परिणामों का स्वरूप

प्रथम भाग में छः भावों के सम्बन्ध में जो साधारण सिद्धान्त दिए गए हैं वे सातवें भाव पर विचार करने में भी लागू होंगे ।

सप्तमेश जो उत्तम स्थिति में है, की दशा के दौरान जातक अपनी पत्नी की संगति का आनन्द उठाएगा। वह रंगीन वस्त्र, जवाहरात, सज्जा, विस्तर प्राप्त करेगा तथा स्वस्थ और तेजस्वी रहेगा। वह विदेश में भ्रमण यात्रा पर जा सकता है। इस दशा में विवाह या इसी प्रकार का पवित्र उत्सव हो सकता है।

यदि सप्तमेश बुरी स्थिति में और पीड़ित हो तो जातक अपनी पत्नी से अलग रह सकता है। दामाद कठिनाई और संघर्ष से गुजर सकता है। जातक ददनाम स्त्रियों के साथ सम्बन्ध के कारण कष्ट में पड़ सकता है और निरुद्देश्य इधर-उधर घूमेगा। वह गुप्तांग में रोग से पीड़ित हो सकता है और इससे दुखी होगा ।

विवाह का समय

प्राचीन पुस्तकों में विवाह के समय के लिये अनेक पद्धतियों का सुझाव दिया गया है-

जिस राशि में सप्तमेश स्थित है उसके स्वामी या नवांश में जिस राशि में सप्तमेश स्थित है उसके स्वामी के दशा काल में शादी हो सकती है। कारक या सातम भाव का नैसर्गिक कारक शुक्र और चन्द्रमा भी अपने दशा काल में शादी करा सकते हैं। इन स्वामियों में जो बली हैं वह अपनी दशा में शादी करा देगा।

सप्तमेश यदि शुक्र से युक्त हो तो वह अपनी दशा या भुक्ति में शादी करा सकता है।

द्वितीयेश या नवांश में द्वितीयेश जिस राशि में स्थित है उसका स्वामी भी अपनी दशा में शादी कराने में सक्षम है। यदि पहली दशाओं में शादी नहीं होती तो नवमेश और दसमेश शादी कराने में सक्षम होता है।

सप्तमेश के साथ युत ग्रह या सप्तम भाव में स्थित ग्रह की दशा में भी शादी संभव है।

यद्यपि अनेक ऐसे ग्रह हैं जो अपनी दशा में शादी कराने में सक्षम हैं, अन्य कारणों से होने वाले विलम्ब पर विचार अवश्य करना चाहिए।

यदि दशानाथ अधिक बली न हो तो लग्न और चन्द्रमा से सप्तम भाव और सप्तमेश तथा शुक्र पर शनि की दृष्टि होने पर शादी देर से होती है।

सप्तम भाव, सप्तमेश और कारक पर ६, ८ और १२ वें भाव के स्वामी की दृष्टि या युति से भी शादी देर से होती है। जन्म समय की स्थिति और दशा को प्रमुख महत्व देना चाहिये और गोचर पर बाद में विचार करना चाहिये ।


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