ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुण्डली के तृतीय, नवम तथा द्वादशवें भाव द्वारा यात्रा के बारे में विचार किया जाता है। तृतीय भाव से छोटी यात्राओं, नवम भाव से लम्बी तथा धार्मिक यात्राओं तथा द्वादशवें भाव से विशेष रूप से विदेश यात्रा के बारे में अध्ययन किया जाता है। इन भावों अथवा इनके भावेश (तृतीयेश, नवमेश तथा द्वादशेश का लग्नेश तथा भाग्येश) से सम्बन्ध होने पर जातक परदेश गमन करता है।

चर, स्थिर एवं द्विस्वभाव राशि – विदेश यात्रा करने के लिए विशेष रूप से चर राशि अथवा चर राशि से सम्बन्ध रखने वाले ग्रहों का विशेष योगदान रहता है अतः सर्वप्रथम राशियों के स्वभाव का ज्ञान करें ।

मेष, कर्क, तुला, मकर = चर राशियां

वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ = स्थिर राशियां

मिथुन, कन्या, धनु, मीन = द्विस्वभाव राशियां

विदेश यात्रा

कुंडली में विदेश यात्रा का विचार करने के लिये द्वादश भाव, उसके स्वामी और यात्रा के कारक शुक्र को मुख्य रूप से देखना चाहिये। इनकी स्थिति जितना अच्छी होगी उतना ही विदेश यात्रा के योग प्रबल होंगे।

विदेश यात्रा करने प्रयोजन

  • यदि द्वादशेश का सम्बन्ध दशमेश से हो तो जातक व्यापार-व्यवसाय सम्बन्धी कार्यवश यात्रा करता है।
  • यदि द्वादशेश का सम्बन्ध पंचमेश से है तो जातक शिक्षा अथवा अध्ययन प्रयोजनार्थ विदेश जाता है।
  • द्वादशेश व षष्ठेश का कुण्डली में सम्बन्ध नौकरी के प्रयोजन से विदेश-यात्रा करने का संकेत देता है।

विदेश यात्रा के योग

पाठकों की जानकारी के लिए प्रमुखतः विदेश यात्रा के योग दे रहा हूं।

  • जन्म कुण्डली में यदि षष्ठेश अर्थात् छठे भाव में स्थित राशि का स्वामी 6, 8, या 12 भाव में हो।
  • जन्म कुण्डली में यदि अष्टमेश अर्थात् आठवें भाव में स्थित राशि का स्वामी 6, 8, या 12 भाव में हो ।
  • जन्म कुण्डली में यदि द्वादशेश अर्थात् बारहवें भाव में स्थित राशि का स्वामी 6, 8, या 12 भाव में हो ।
  • द्वादशेश उच्च का अथवा बली हो तो जातक विदेश यात्रा करता है।
  • द्वादशेश अपनी उच्च या स्वराशि में शुभ ग्रह के साथ हो ।
  • द्वादशेश द्वादश भाव में तथा लग्नेश एवं नवमेश त्रिकोण में हों ।
  • द्वादशेश का वक्री ग्रह से सम्बन्ध हो तो लम्बी यात्रा करता है ।
  • नवमेश एवं लग्नेश अपने-अपने भाव में हों, अर्थात लग्नेश लग्न में तथा नवमेश नवम में ही हों।
  • नवमेश लग्न में तथा लग्नेश नवम भाव में हों।
  • लग्न व लग्नेश चर राशि में हों तथा चर राशिस्थ ग्रह से दृष्ट हो ।
  • लग्न में द्वादशेश स्थित हो तथा द्वादशेश की महादशा या अन्तरदशा चल रही हो तो जातक लम्बी यात्रा करता है ।
  • केतु की नवम अथवा द्वादश भाव स्थिति अथवा दृष्टि अचानक धार्मिक यात्रा करवाती है।
  • दशम स्थान में राहु चर राशि में हो तो जातक लम्बी यात्रा (राज्य कार्य से) करता है।
  • चतुर्थ भाव पर सूर्य, शनि व राहु की दृष्टि अथवा स्थिति जातक को स्वयं के घर में नहीं रहने देती। अतः जातक मजबूरीवश अन्यत्र जाकर बसता है

यदि तृतीयेश, नवमेश अथवा द्वादशेश का लग्नेश, भाग्येश तथा उच्च या स्वराशिगत सुखेश से सम्बन्ध होने के साथ-साथ यात्राकारक ग्रह योग हो तो जातक सुखद यात्रा करता है।

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इसके विपरीत नीच राशिगत या शत्रु क्षेत्री सुखेश यात्राकारक तृतीयेश, नवमेश अथवा द्वादशेश से सम्बन्ध करता है तो यात्रा कष्टकारी रहती है।

यदि इनमें से कोई एक कारण भी हो तो व्यक्ति विदेश यात्रा अवश्य करता है। इनमें भी यदि एक की दशा में अन्य की दशा आ जाय तो उस समय जातक विदेश यात्रा अवश्य करता है।

अनुभव में आया है कि कभी-कभी किसी ग्रह के अप्रभावी होने के कारण, अस्त होने के कारण पूर्ण योग घटित नहीं होता है, ऐसी स्थिति में कुछ उपाय कर, उचित रत्न धारण कर या यन्त्र-पूजा, मन्त्र जाप आदि से भी स्थिति में सुधार संभव होता है। योग का पूर्ण फल मिलने लगता है।

नीचे दी गई जन्म कुण्डली का जातक अमेरिका में चिकित्सक हैं। इनकी कुण्डली में

  • तृतीय भाव में चर राशि अर्थात् कर्क राशि स्थित होना, इस राशि में यात्रा कारक ग्रह शुक्र का स्थित होना, तृतीय भाव पर चर राशि मकर के स्वामी की भी दृष्टि होना,
  • नवम भाव में भी चर राशि का होना, इस चर राशि के स्वामी की शनि का स्थित होना, इसी भाव पर यात्रा कारक ग्रह शुक्र की दृष्टि होना,
  • द्वादश भाव में चर राशि होना, पुनः उस राशि (मेष) के स्वामी की भी द्वादश भाव पर दृष्टि होना सभी योग विदेश यात्रा का प्रबल संकेत देते हैं।

अतः जातक शनि के मकर राशिगत गोचर तथा द्वादश भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रह केतु की महादशा में अमेरिका गया तथा अब वह वहां रहने के दौरान कई बार स्वदेश आया। व्ययेश (द्वादशेश) के पंचम भावगत स्थित होने से शुरू उच्च अध्ययन हेतु गया। षष्ठेश का नवमेश में दृष्टि सम्बन्ध भी है। अतः जातक नौकरी भी कर रहा है।

नीचे दी गई कुण्डली के जातक को एक विदेशी कम्पनी में उच्च पद पर कार्यरत होने से कई बार विदेश यात्राओं का अवसर मिला। आइए इनकी कुण्डली के योगों का विश्लेषण करें।

  • तृतीय, नवम तथा द्वादश भाव में चर राशि (तुला, मेष व कर्क) होना, तीनों चर राशियों के स्वामी की पंचम भाव में युति होना,
  • इनमें द्वादशेश चन्द्रमा का भाग्येश तथा सुखेश मंगल के साथ होना,
  • लग्नेश का चर राशिगत (मकर) होकर द्वादश भाव पर दृष्टि होना ।
  • द्वादशेश चन्द्रमा का लग्नेश सूर्य से भी द्वादश भावगत जाना,
  • केतु की द्वादशवें भाव पर दृष्टि होना सभी योग विदेश भ्रमण हेतु उत्तरदायी हैं।

चूंकि व्ययेश (द्वादशेश) चन्द्रमा स्वयं जल यात्रा का कारक ग्रह है, यह वायुयान यात्राकारक ग्रह शनि के साथ है। अतः जातक ने जल तथा वायुयान दोनों की यात्रा की।

पुनः शनि के सप्तमेश होने से जो द्वादशेश चन्द्रमा के साथ है, पत्नी के साथ यात्रा करने का योग बनाता है। अतः जातक की पत्नी का भी विदेश यात्रा योग पूर्ण हुआ।


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