कुंडली के आठवें भाव का फलादेश
अष्टम भाव से आयु, पैत्रिक सम्पति, उपहार और अनअर्जित धन, मृत्यु के स्वरूप, अपयश, अपमान और मृत्यु से सम्बन्धित विवरण का विचार किया जाता है।
अष्टमेश का विभिन्न भावों में फल
1. प्रथम भाव में – जिस व्यक्ति को कुण्डली में अष्टमेश लग्न में लग्नेश के साथ स्थित हो वह व्यक्ति दरिद्र होगा और अभाव में रहेगा। हर कदम पर उसका भाग्य उसका साथ नहीं देगा। यदि अष्टमेश निर्बल हो या नवांश लग्न से छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो दुर्भाग्य की तीव्रता कम हो जाती है।
यदि अष्टमेश बुरी तरह पीड़ित हो तो जातक शारीरिक कष्ट से पीड़ित होगा अर्थात् और रोग और विकृति। उसके शरीर की बनावट कमजोर होगी सुख प्राप्त नहीं होगा। उसके वरिष्ठ उससे खुश नहीं रहेंगे। सरकार की ओर से कष्ट के कारण उसे चिन्ता रहेगी।
2. द्वितीय भाव में – यदि अष्टमेश द्वितीयेश के साथ दूसरे भाव में स्थित हो तो वह व्यक्ति सभी प्रकार के कष्ट और समस्याओं से घिरा रहेगा। जातक आंख और दाँत के कष्ट से पीड़ित रहता है। उसे अस्वास्थ्यकर तथा स्वादहीन भोजन करना पड़ता है। उसका घरेलू जीवन असन्तोष और झगड़ों से भरा रहेगा। उसकी पत्नी उसे समझ नहीं पाएगी। इसके परिणाम स्वरूप आपस में मनमुटाव होगा और दोनों अलग भी हो सकते हैं। यदि आयु ठीक है तो उसे गम्भीर बीमारी लग सकती है।
यदि अष्टमेश नवांश लग्न से ६, ८ या १२ वे भाव में हो तो इस परिणाम की तीव्रता कम हो जाएगी।
3. तृतीय भाव में – यदि अष्टमेश तृतीयश के साथ तीसरे भाव में स्थित हो तो तीसरे भाव के फल में कमी आती है। जातक को कान की बीमारी हो सकती है या वह बहरा हो सकता है। भाई बहनों के साथ मदभेद होगा जिससे कलह होगा। जातक सभी प्रकार के भय और मानसिक चिन्ताओं से घिरा रहेगा।
वह मायामोह में फंसा रह सकता है। वह कर्ज में जा सकता है और इससे उसे कष्ट होगा।
यदि तृतीयेश से युक्त तीसरे भाव में स्थित अष्टमेश किसी कारक ग्रह से पीड़ित हो तो जातक का उत्पीड़न बर्दास्त से बाहर होगा।
किन्तु यदि अष्टमेश पष्ठेश या द्वादशेश से युक्त हो तो उससे परिणाम शुभ हो सकते हैं। वह लेखन या एजेन्सी के माध्यम से धन प्राप्त कर सकता है।
4. चतुर्थ भाव में – यदि अष्टमेश चतुर्थेश से युक्त होकर चौथे भाव में स्थित हो तो जातक की मानसिक शान्ति छिन्न भिन्न रहेगी। घरेलू कलह, वित्तीय और अन्य समस्याएं बढ़ेंगी। मां का स्वास्थ्य बिगड़ सकता है और इससे क्षति हो सकती है। जातक अपने मकान, भूमि और सवारी के सम्बन्ध में समस्याओं से घिरा रह सकता है।
यदि बुरे प्रभाव अधिक हों तो उसकी भूमि और अचल सम्पत्ति उसके हाथ से जा सकती है जिस पर वह नियन्त्रण नहीं कर पाएगा । उसकी सवारियां गुम हो सकती हैं या नष्ट हो सकती हैं। उसके पालतू पशु बीमार हो सकते हैं या मर सकते हैं।
अत्यधिक बुरा प्रभाव होने पर वह विदेश में अपने भाग्योदय के लिये जा सकता है जहां उसे सभी प्रकार की हानियों और कष्ट का सामना करना पड़ेगा । पेशे में विपरीत स्थिति और अपने वरिष्ठों को नाराजगी की सम्भावना है।
5. पंचम भाव में – यदि अष्टमेश पंचमेश के साथ पंचम भाव में स्थित हो तो जातक के बच्चे कष्ट पा सकते हैं। वे अपराध कर सकते हैं और ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं जिसका जातक की प्रसिद्धि पर प्रभाव पड़ेगा अथवा जातक और उसके पिता के बीच मतभेद हो सकता है। जातक का बच्चा बीमार हो सकता है। और उससे वह पीड़ित होगा।
यदि बुरे प्रभाव अधिक हों तो एक बच्चे की जन्म लेते ही मृत्यु हो सकती है या शारीरिक उत्पीड़न अथवा मानसिक बाधा के कारण जातक की चिन्ता बढ़ सकती है जातक अपने स्वास्थ्य से भी पीड़ित रह सकता है।
यदि अष्टमेश नवांश लग्न से ६, १२ या ८ वें भाव में हो तो बुरे फल काफी कम हो जाते हैं परन्तु यदि केन्द्र या त्रिकोण में बली हो तो परिणाम और गहन हो जाते हैं । चूंकि पंचम भाव बुद्धि का स्थान होता है अतः जातक उत्तेजना या मानसिक खराबी से पीड़ित हो सकता है ।
6. छठे भाव में – यदि अष्टमेश षष्ठेश से युक्त होकर छठे भाव में स्थित हो तो राजयोग बनता है। इसके परिणाम स्वरूप अपार धन, प्रसिद्धि और इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है।
किन्तु चूँकि छठा भाव रोग स्थान होता है अतः जातक का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा। यदि पीड़ित हो तो जातक को चोरों से धन की हानि होगी और न्यायालय तथा पुलिस से कष्ट होगा।
यदि षष्ठेश बली हो तो वह उसके कष्टों पर काबू पा लेता है और जातक को विजयी बनाता है। उसका बुरा चाहने वालों और शत्रुओं का प्रयास विफल हो जाता है।
7. सप्तम भाव में – यदि अष्टमेश सप्तमेश के साथ सप्तम भाव में स्थित हो तो इससे आयु कम हो जाती है। जातक की पत्नी का स्वास्थ्य खराब रहता है। यदि पीड़ित हो तो जातक भी बीमारियों का शिकार हो जाता है। वह विदेश जा सकता है। जहाँ पर उसका स्वास्थ्य बिगड़ेगा और उसके सामने समस्याएं आएँगी। यदि सप्तमेश और अष्टमेश बाली हों तो जातक राजनयिक उद्देश्यों से विदेश की यात्रा करेगा और स्वयं विख्यात होगा।
8. अष्टम भाव में – यदि अष्टमेश वली होकर अष्टम भाव में स्थित हो तो जातक की आयु लम्बी होती है और सुख प्राप्त करता है। वह पूर्व गुण के आधार पर भूमि, सवारी, अधिकार और स्थिति प्राप्त करेगा । यदि अष्टमेश निर्बल हो तो उसे गम्भीर कष्ट नहीं होगा किन्तु उत्तम भाग्य का आनन्द भी नहीं मिल सकता है। जातक के पिता की मृत्यु हो सकती है या वे संकट में पड़ सकते हैं। यदि अष्टमेश पीड़ित हो तो जातक अपने वचन में असफल रहेगा। गलत काम करने में तत्पर रहेगा और उससे उसे हानि होगी ।
9. नवम भाव में – यदि अष्टमेश नवमेश के साथ नवम भाव में स्थित हो और उस पर अनिष्ट प्रभाव हों तो जातक अपने पिता की सम्पत्ति से वंचित रह सकता है। पिता के साथ मतभेद हो सकता है। यदि पिता का नैसगिक कारक सूर्य पीड़ित हो तो नवमेश के दशाकाल में पिता की मृत्यु हो सकती है।
यदि शुभ प्रभाव से युक्त हो तो जातक को उसके पिता को सम्पत्ति मिलती है। पिता के साथ सम्बन्ध सौहार्द पूर्ण होता है।
यदि नवमेश निर्बल हो तो जातक सभी प्रकार की आर्थिक कठिनाइयों दुख और दुर्भाग्य से पीड़ित रहता है। उसके मित्र और स सम्बन्धी उसे छोड़ जाएंगे और वरिष्ठ अधिकारी उसमें गलती निकालेंगे।
यदि नवांश में अष्टमेश ६, ८ या १२ वें भाव में हो तो बुरे प्रभाव काफी कम हो जायेंगे।

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10. दशम भाव में – यदि अष्टमेश दसमेश के साथ दसम भाव में स्थित हो तो जीवन में जातक की प्रगति धीमी रहेगी। उसे अपने कार्यों में बाधाओं और अड़चनों का सामना करना पड़ेगा। समुचित अवधि में उसके अधीनस्य उससे पहले पदोन्नत हो जाएँगे और उसकी योग्यता पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये धोखा और अनुचित साधनों का सहारा ले सकता है।
उसके विचार घुन्धले होंगे और उनके कार्यों से सरकार का रोष बढ़ेगा। वह दरिद्रता से पीड़ित हो सकता है।
यदि द्वितीयेश भी पीड़ित हो और अष्टमेश से युक्त हो तो अत्यधिक कर्ज और उसे अदा करने में असमर्थ होने के कारण उसकी प्रसिद्धि में कमी आ सकती है।
यदि अष्टमेश नवांश लग्न से 6, 8 या 12वें भाव में स्थित हो तो बुरे प्रभाव में काफी कमी हो जाते है। यदि अष्टमेश दशम भाव में स्थित हो तो बड़ों की मृत्यु के बाद अप्रत्याशित धन की प्राप्ति भी हो सकती है।
11. एकादश भाव में – यदि अष्टमेश एकादशेश के साथ एकादश भाव में स्थित हो तो निकट मित्रों को कष्ट हो सकता है। बड़े भाई के ऊपर विकट समय आ सकता है। उसके साथ सम्बन्ध बिगड़ सकता है अथवा बड़ा भाई अपने अनैतिक व्यवहार और आचरण द्वारा जातक और उसके परिवार के लिए यन्त्रणा का कारण बन सकता है। कारोबार में हानि हो सकती है और वह कर्ज में जा सकता है।
यदि इस योग पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो कष्ट होगा किन्तु इसपर काबू पाने के लिए जातक को मित्रों और बड़े भाई से सहायता मिलती है। बुरे प्रभावों से अशुभ परिणामों में वृद्धि हो जाती है।
12. द्वादश भाव में – यदि अष्टमेश १२ वें भाव के स्वामी के साथ १२ वें भाव में स्थित हो तो राजयोग बनता है।
यदि कोई शुभ ग्रह अष्टमेश से युक्त हो तो विपरीत परिणाम की आशा की जा सकती है। मित्र के विश्वासघात के फलस्वरूप अनेक समस्याएँ और दुख आ सकता है। अप्रत्याशित व्यय होगा और आर्थिक हानि होगी।
यदि अष्टमेश १२ वें भाव में हो और द्वादशेश त्रिकोण या केन्द्र में अनुकूल स्थिति में हो तो जातक को धार्मिक अध्ययन और धर्मपरायणता में लाभ होगा। उसपर प्राधिकार सम्बन्धी कुछ पद और स्थान थोप दिया जाएगा। यदि अशुभ ग्रहों से पीड़ित हो तो जातक गुप्त रूप से अनैतिक कार्यों का सहारा ले सकता है। इस प्रकार के कार्यों में बलात्कार, व्यभिचार, धन की जालसाजी (बारहवाँ भाव गुप्त और धोखाधड़ी का भाव होता है। अष्टम भाव अचानक धन की प्राप्ति का द्योतक होता है) और व्यापार शामिल होगा ।
ये फल साधारण होते हैं, लग्न, चन्द्रमा और चालू दशा के बल के आधार पर इनमें कमी बेसी हो सकती है।
जहाँ फल अपराध कार्य से सम्बन्धित हो वहाँ लग्न, चन्द्रमा और दसम भाव (कर्मस्थान) के बल पर विचार करके ही भविष्यवाणी करनी चाहिए। यदि ये तथ्य अनुकूल हों तो जातक कुछ और ढंग से कार्य करने को लालायित होगा। वह अपनी बुरी लालसा पर काबू पा लेगा और स्वयं को नियन्त्रित कर लेगा।
यदि अष्टम भाव में मारक ग्रह स्थित हो तो जातक की अप्राकृतिक मृत्यु होती है जैसे आत्महत्या, हत्या या दुर्घटना यदि अष्टम भाव पर शुभ ग्रहों के प्रभाव हों तो स्वाभाविक मृत्यु होती है अर्थात् बीमारी से या बुढ़ापे से । यदि अष्टमेश का आपस में सम्बन्ध हो तो स्वास्थ्य खराब होने से मृत्यु होती है, यदि इस मामले में छठा भाव और आठवॉ भाव बुरी तरह पीड़ित हों तो लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु होती है जैसा कि चिरकालिक रोग के मामले में होता है ।
अष्टम भाव में स्थित ग्रह
1. सूर्य – यदि अष्टम भाव में उच्च का सूर्य स्थित हो तो जातक की आयु लम्बी होती है। वह आकर्षक और कुशल वक्ता होता है।
यदि सूर्य पीड़ित हो तो चेहरे और सिर में घाव से कष्ट पाएगा और जीवन में असंतुष्ट रहेगा । उसकी आंखें कमजोर होंगी। वह दरिद्रता से पीड़ित होगा और शान्त जीवन बिताएगा।
यदि अष्टमेश या एकादशेश से युक्त हो तो उसे सट्टा के माध्यम से अचानक धन प्राप्त हो सकता है। उसे संतान कम और अधिकतर पुरुष होंगे ।
2. चन्द्रमा – अष्टम भाव में चन्द्रमा के स्थित होने पर जातक मानसिक रूप से भ्रमित होता है । वह भयभीत होता है और मनोदशा से पीड़ित रहता है। वह हास्यास्पद और अस्वस्थ होगा। जातक के बाल्यकाल में ही माता की मृत्यु हो सकती है । उसका शरीर पतला होगा और आँखें कमजोर होंगी। वह विरासत में आसानी से धन प्राप्त करता है । वह लड़ाई और मनोविनोद का शौकीन होगा तथा उदार दिल वाला होगा। जातक को अधिक पसीना आएगा।
यदि मंगल और शनि से युत चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो जातक की आंख की रोशनी प्रभावित होगी ।
2. मंगल – यदि कोई अन्य उपशमन तथ्य न हों तो जातक की आयु कम होगी और उसकी पत्नी (या पति) की मृत्यु हो सकती है। उसके बच्चे कम होंगे। वह विवाहेतर जीवन का सहारा लेकर अपनी काम वासना को संतुष्ट करना चाहेगा। वह अपने संबन्धियों से घृणा करेगा। उसके घरेलू जीवन में कलह रहेगा और वह बवासीर जैसे खून की बीमारी से पीड़ित रहेगा । वह अनेक लोगों पर शासन करेगा।
3. बुध – जब अष्टम भाव में हो तो जातक में अनेक उत्तम गुण होंगे। वह अपनी सौजन्यता और शिष्टता के लिए प्रख्यात होगा। वह पूर्वजों की अपेक्षा स्वअर्जन से काफी धन प्राप्त करेगा वह विद्वान होगा और अनेक विषयों में अपनी विद्वत्ता के लिए विख्यात होगा । काफी समय तक जीवित रहेगा किन्तु उसका शरीर कमजोर होगा ।
4. बृहस्पति – जातक दुखी किन्तु उदार हृदय वाला होगा। वह काफी समय तक जीवित रहेगा। उसे बोलने में कठिनाई होगी। वह नीच काम कर सकता है किन्तु उच्च बनने का नाटक करेगा। वह विधवाओं के साथ सम्पर्क रख सकता है। उसकी आदतें गन्दी होंगी और वह वृहदंत्र शोष से पीड़ित होगा। उसकी मृत्यु बिना दर्द के होगी।
5. शुक्र – अष्टम भाव में शुक्र की स्थिति से अनेक लाभ हैं। जातक के पास काफी घन होगा। वह आराम का जीवन बिताएगा और उसके पास जीवन की सारी सुविधाएँ होंगी। जातक की माँ को खतरा हो सकता है। जातक को जीवन के आरम्भ में भावनात्मक विरक्ति हो सकती है जिससे वह बाद के जीवन में साधुता का सहारा ले सकता है। यदि शुक्र अष्टम भाव में उच्च का हो तो जातक को काफी धन प्राप्त होता है।
6. शनि – अष्टम भाव में शनि स्थित होने पर आयु अच्छी होती है किन्तु जीवन में अनेक उत्तरदायित्व होते हैं। जातक अनेक कठिनाइयों के साथ अति अध्यवसाय के माध्यम से अपना कार्य करेगा। उसकी आँखें दोष पूर्ण होंगी। उसके बच्चे कम होंगे। वह तोंद वाला होगा तथा अपनी जाति से बाहर की स्त्री की संगति का इच्छुक होगा। वह दमा और फेंफड़े के रोग से पीड़ित रह सकता है।
यदि अष्टम भाव में शनि के साथ चन्द्रमा हो तो इससे उदर वायु और प्लीहा का कष्ट होता है।
7. राहु – जातक लोक निन्दा से पीड़ित होगा। वह अनेक बीमारियों से कष्ट पाएगा। वह दुष्ट, झगड़ालू और चरित्रहीन होगा।
8. केतु – यदि अष्टम भाव में केतु शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक के पास काफी घन होगा और बहुत समय तक जीवित रहेगा। यदि केतु पीड़ित हो तो जातक दूसरों के धन और स्त्री की आकांक्षा करता है। वह मलवाहिनी प्रणाली में अन्यवस्था के कारण और चरित्रहीनता के कारण रोगों से पीड़ित रहेगा।
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