कुंडली के चौथे भाव का फलादेश

चतुर्थ भाव माँ, अचल सम्पत्ति, शिक्षा, सवांरी और सामान्य सुख से सम्बन्धित होता है। इससे यह स्पष्ट है कि चौथे भाव के पीड़ित होने पर वह व्यक्ति मानसिक शान्ति से वंचित रह सकता है जिससे उसकी माँ को कष्ट हो सकता है, सम्पत्ति के सम्बन्ध में परेशानी हो सकती है आदि ।

ज्योतिष में सबसे बड़ी कठिनाई यह आती है कि किसी भाव से सम्बन्धित विभिन्न घटनाओं को किस प्रकार अलग किया जाए। और हमारे द्वारा अपनाई गई विधि से इस कठिनाई का कुछ सीमा तक निराकरण हो जाता है ।

चौथे भाव का विश्लेषण करने से पहले ज्योतिषी को निम्नलिखित के सामान्य बल का अध्ययन कर लेना चाहिए (क) भाव (ख) कारक (ग) उसके स्वामी और वहाँ स्थित ग्रह । कुण्डली में विद्यमान विभिन्न योगों में से जिनका सम्बन्ध चौथे भाव से है उन्हें सावधानी पूर्वक नोट कर लेना चाहिए ।

सर्व प्रथम हम सामान्य योगों पर विचार करेंगे और उसके बाद ग्रहों के प्रभावों पर । चौथा भाव दसवें भाव की तरह अति महत्त्वपूर्ण भाव है और वास्तव में यह वह घुरी है जिस पर किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने वाली सभी घटनाएँ घूमती है ।

विभिन्न भावों में चतुर्थेश की स्थिति के अनुसार फल

1. प्रथम भाव – वह व्यक्ति बहुत विद्वान होता है किन्तु लोगों की भीड़ में बोलने से डरता है । वह पैत्रिक सम्पत्ति से वंचित हो सकता है। लग्न में स्थित चतुर्येश के बली होने, मध्यम या क्षीण होने के अनुसार यह पता लगता है कि जातक अमीर मध्यम या गरीब परिवार में जन्म लेगा ।

2. दूसरा भाव – वह बहुत ही भाग्यशाली, साहसी और सुखी होगा । उसका स्वभाव व्ययप्रिय होगा। उसे मां के पूर्वजों से धन की प्राप्ति होगी ।

3. तीसरा भाव – वह व्यक्ति रोगी, उदार और चरित्रवान होगा तथा अपने प्रयासों से धन अर्जित करेगा । वह सौतेले भाइयों तथा सौतेली मां से दुखी होगा ।

4. चौथा भाव – धार्मिक होगा तथा परम्पराओं का आदर करेगा। वह अमीर, सम्मानित, सुखी और सांसारिक होगा ।

5. पाचवाँ भाव — अन्य व्यक्तियों द्वारा प्यार पाएगा तथा सम्मानित होगा । विष्णुं का उपासक तथा अपने प्रयासों से धनी होगा । मां सम्मानित परिवार की होगी । जातक के पास अपनी सवारी होगी ।

6. छठा भाव – चिड़चिड़ा तथा कमीना, उसकी आदतें पाखण्डी होंगी तथा उसके विचार एवं इच्छाएं दुष्टतापूर्ण होंगी । वह हमेशा घूमता रहेगा ।

7. सातवाँ भाव – साधारणतः सुखी होगा; उसके पास मकान और भूमि होगी; यदि सातवां भाव चर राशि में हो तो उसे जीविका दूर स्थान पर मिलेगी और यदि स्थिर राशि हो तो जन्म स्थान के पास वृत्ति मिलेगी।

8. आठवां भाव – ऐसा व्यक्ति दुखी होता है। पिता की शीघ्र मृत्यु हो जाती है। वह या तो नपुंसक होगा या सेक्स की शक्ति खो देगा । भूसम्पत्ति का नाश या मुकदमेबाजी में पडने की सम्भावना है ।

9. नौवां भाव – पिता और सम्पत्ति के मामले में यह एक भाग्यशाली योग है जिससे जातक को सुख प्राप्त होता है।

10. दशम भाव – उसको राजनीति में सफलता मिलेगी। वह एक निपुण रसायनज्ञ होगा । वह अपने शत्रुओं का नाश करेगा और वह संसार का महान व्यक्तित्व वाला होगा । यदि चतुर्थेश पीड़ित हो तो प्रसिद्धि का विनाश हो सकता है ।

11. ग्यारहवां भाव – स्वनिर्मित, उदार, रोगी, मां भाग्यशाली किन्तु सौतेली मां हो सकती है। पशु और भूमि की खरीद विक्री में सफलता मिलेगी ।

12. बारहवां भाव – सुख और सम्पत्ति से वंचित रहेगा। मां की शीघ्र मृत्यु हो जाएगी आर्थिक स्थिति खराब रहेगी तथा दुःखी रहेगा ।

यह ध्यान में रखना चाहिए कि ये योग सामान्य हैं और इन्हें ज्यों का त्यों लागू नहीं करना चाहिए । कतिपय भाव में स्थित चतुर्थेश से होने वाले परिणामों के अच्छे या बुरे स्वरूप में चतुर्थेश के बलाबल के अनुसार घटाबढ़ी होती है।

उदाहरणस्वरूप महान् सत्याचार्य कहते हैं कि जब चतुर्थेश शुभ वर्ग में हो और उस पर शुभ दृष्टि हो और तीसरे भाव में हो तो उसके पास बहुत थोड़ी अचल सम्पत्ति होगी और इस प्रकार का चतुर्थेश उस व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति से वंचित कर देगा साथ ही सौतेले भाइयों और सौतेली मां के कारण उसे कष्ट में डाल देगा । यदि चतुर्थेश पीड़ित हो तो वह दुष्ट प्रकृति का हो जाएगा। यदि चतुर्थेश बुरी तरह से पीड़ित हो तो उससे होने वाले बुरे परिणाम और गहन हो जाएँगे ।

किसी भाव पर निर्णय करने में ज्योतिषी की व्याख्या बुद्धिसंगत और कुशल होनी चाहिए न कि मूलार्थक ।

चौथे भाव में ग्रह

1. सूर्य – इस योग से जातक सामान्यतः अप्रसन्न और मानसिक रूप से दुःखी रहता है। वह घूमता रहेगा। इस स्थिति में कुछ पैत्रिक सम्पत्ति मिलती है। जादू टोना और दार्शनिक अध्ययन में उसकी रुचि रहेगी। राजनैतिक क्षेत्र में सफलता कठिनाई से मिलेगी । यदि सूर्य पर शनि या मंगल की दृष्टि हो तो जीवन में रुकावटें आएँगी ।

2. चन्द्रमा – उसका अपना मकान होगा, सम्बन्धियों से सुख मिलेगा, हमेशा खुश और सन्तुष्ट रहेगा; नेता या शासक के रूप में महत्त्वपूर्ण होगा; अभिमानी और कुछ झगड़ालू होगा।

यदि चन्द्रमा पीड़ित हो; उस पर बृहस्पति की दृष्टि न हो; ऐसी स्थिति में मां से शीघ्र ही अलग हो जाता है; ऐन्द्रिय आनन्द का शौकीन होगा।

3. मंगल – साधारणतः यह एक खराब योग है। जातक मां, मित्रों और सम्बन्धियों के सुख से वंचित रहेगा किन्तु राजनीति क्षेत्र में सफल रहेगा । मां के साथ झगड़ा होगा और पारिवारिक जीवन समाप्त हो जाएगा।

यदि मंगल के साथ राहु या केतु की युति हो तो उस व्यक्ति के आत्महत्या करने की प्रवृत्ति होगी । उस व्यक्ति का अपना मकान होगा किन्तु उससे वह खुश नहीं रहेगा ।

4. बुध – जातक शिक्षा शास्त्री या राजनयिक होगा । वह सरकार की आलोचना करेगा । वह महान व्यक्ति बनेगा। उसके पास सवारी होगी। उसके पिता स्वनिर्मित व्यक्ति होंगे। उसे संगीत और अन्य ललित कला का शौक होगा और देश में दूर-दूर यात्रा करेगा । वह बोलने में मधुर होगा ।

5. वृहस्पति – दार्शनिक, विद्वान, शासक वर्ग की अनुकम्पा, शत्रुओं का भय, धार्मिक, सम्मानित और भाग्यशाली, पारिवारिक वातावरण शान्तिपूर्ण और अध्यात्मिक होगा।

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6. शुक्र – संगीत में निपुण, अच्छे स्वभाव वाला, मां के साथ विशेष स्नेह, अनेक मित्र, सवारी और मकान, धार्मिक इच्छाओं की सफलतापूर्वक उपलब्धि । घरेलू प्रकार के कार्य, मन्त्री और सुख के लिए यह अनुकूल योग है।

7. शनि – आरम्भ के वर्षों में बीमार मां के सुख से वंचित और दुखी, वायु और कफ की शिकायत, सुस्त प्रवृत्ति; पैत्रिक सम्पत्ति नहीं मिलेगी, मकान और सवारी से कष्ट मिलेगा, सम्बन्धी पसन्द नहीं करेंगे, एकान्त जीवन बिताने की इच्छा, यदि शुभ दृष्टि या युति न हो तो घरेलू और पारिवारिक जीवन अनुकूल नहीं होगा ।

8. राहु – व्यवहार में मूर्ख, नए मित्र, कपटी होगा या कपट के कार्य में दोषी ठहराया जाएगा।

9. केतु — मां, सम्पत्ति, सुख से वंचित रहेगा। विदेश में जीवन बिताएगा । जीवन के अन्त में कटु अनुभव होंगे। जीवन में गति अवरोध और अचानक परिवर्तन आएगा ।

यह देखने में आएगा कि सूर्य यॉ अन्य ग्रहों के चौथे भाव में स्थित होने के कारण होने वाले परिणामों में अन्य ग्रहों की दृष्टि या युति से परिवर्तन हो जाता है । यदि सूर्य बली हो तो उत्तराधिकार द्वारा धन लाभ होता है; यदि पीड़ित हो तो राजनैतिक स्रोतों से कष्ट होगा।

यदि चन्द्रमा पर शुभ दृष्टि या युति हो और वह बली हो तो व्यक्ति को मानसिक शान्ति रहती है। यदि उस पीड़ित हो तो विपरीत परिवर्तन का संकेत मिलता है।

यदि पीड़ित ग्रह मंगल हो तो चोरी, धोखा और मुकदमे बाजी से हानि होगी । मंगल के पीड़ित होने पर निजी जीवन में दुख, झगड़ा, संघर्ष, मतभेद का संकेत मिलता है। यदि मंगल पर शुभ ग्रहों की युति या दृष्टि हो तो बुरे फल कम हो जाएंगे ।

बुध के पीड़ित होने पर मानसिक पीड़ा, कपट और दुख का संकेत मिलता है। यदि बुध यहाँ पर उत्तम स्थिति में हो तो यह बुद्धिजीवी और साहित्यिक उपलब्धि के लिए अच्छी स्थिति है।

पीड़ित वृहस्पति के कारण आर्थिक कठिनाई और रुकावट आती है। यदि बृहस्पति बली हो तो चौथे भाव से सम्बन्धित सभी घटनाओं के सम्बन्ध में सम्पन्नता होती है । उस व्यक्ति का जीवन शान्तिपूर्ण होगा ।

शुक्र पीड़ित होने पर नैतिक पतन होता है। चौथे भाव में शुक्र का बली होना कुण्डली वाले के लिए एक परिसम्पत्ति है। इससे एक बड़ा कलाकार बनने का संकेत मिलता है।

शनि यदि लग्नाधिपति न हो तो उसका चौथे भाव में स्थित होना अनुकूल नहीं है । यह उस व्यक्ति की मानसिक शान्ति भंग कर देता है और मी का सुख छीन लेता है। ऐसा व्यक्ति एकान्त जीवन पसन्द करता है। मंगल द्वारा पीड़ित होने पर अचानक पतन होता है। यह उन्माद का भी योग है। राहु-मंगल या केतु मंगल से पीड़ित होने पर दुख और तोड़ फोड़ होता है। राहु-शनि और केतु-शनि से पीड़ित होने पर मानसिक अव्यवस्था, हिस्टीरिया या पागलपन का भी सकेत मिलता है ।

इन सभी मामलों में बुरे और अच्छ प्रभावों की सावधानी पूर्वक जांच आवश्यक है । अतार्किक व्याख्या नहीं करनी चाहिए और अपरिपक्व निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहिए ।

माँ

मां के दीर्घ जीवन का अनुमान चौथे भाव के बल के अनुसार तथा चन्द्रमा की स्थिति तथा उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि से लगाना चाहिए। मां के लग्न के रूप में चौथे भाव या मातृकारक को मानकर और वहाँ से अष्टम भाव के बलावल का अध्ययन करके भी मां के दीर्घ जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है।

जब चतुर्थेश ६ या १२वें भाव में हो, क्षीण हो और लग्न के साथ मारक ग्रह की युति हो तो मां की शीघ्र मृत्यु हो जायेगी । निम्नलिखित योगों पर भी ध्यान दें-

(१) क्षीण चन्द्रमा जो 6 या बारहवें भाव में मारक ग्रह के साथ युक्त हो,

(२) शनि चन्द्रमा के साथ चौथे भाव में

महत्वपूर्ण योग

नीचे चौथे भाव से सम्बन्धित महत्वपूर्ण योग दिए जाते हैं :

1. यदि चतुर्थेश ६, ८, और १२ वें भाव में हो और उस पर कोई शुभ दृष्टि न हो तो मां की शीघ्र मृत्यु हो जाएगी ।

2. चतुर्थेश लग्न भाव में हो और शुक्र चौथे भाव में बली हो तो सवारी, जवाहरात और धन देता है।

3. यदि चतुर्थेश दुःस्थान में हो या यदि चौथे भाव में मंगल या शनि हो तो वह व्यक्ति अपनी सम्पत्ति और धन खो देगा।

4. यदि वृहस्पति चौथे भाव में हो और चतुर्थेश शुभ के साथ हो तो उस व्यक्ति के अच्छे दोस्त होंगे। यदि चोथा भाव या चतुर्थेश पापकर्तरी योग में हो तो जातक बुरे लोगों के साथ में रहता है ।

5. २, ४, और १२ वें भाव के स्वामी यदि केन्द्र या त्रिकोण में हों तो सम्पत्ति और मकान के सम्बन्ध में उत्तम होता है।

6. यदि चतुर्थेश लग्न में या सातवें भाव में हो तो जातक को बिना कठिनाई के मकान मिलता है। चतुर्थेश अष्टम भाव में पीड़ित या नीच का हो तो जातक अपनी भूमि या मकान से वंचित हो जाता है ।

7. यदि चतुर्थेश और दशमेश के बीच परिवर्तन योग हो तो जातक को भूमि मिलती है। यदि परिवर्तन योग बनाने वाले स्वामी अति प्रबल हों और गोपुरांश में हों तो वह व्यक्ति शासक भी बन सकता है ।

8. चतुर्थेश और षष्ठेश के बीच परिवर्तन योग से शत्रुओं से भूमि मिलती है ।

9. क्षीण वृहस्पति और चौथे भाव में बुरे ग्रह होने पर जातक के पास धन नहीं होता । जातक सरकारी आदेशों से भूमि खो देता है ।

10. यदि चतुर्थेश सूर्य के साथ नीच का हो, चौथे भाव में कई दुष्ट ग्रह हों और चतुर्थेश शत्रु के भाव में हो तो वह व्यक्ति महापापी होता है ।


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