मंत्र द्वारा ग्रह शांति

मंत्र द्वारा ग्रह शांति सबसे अधिक शक्तिशाली तथा अचूक रक्षक उपाय है भक्ति तथा ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना, जिसके विषय में पहले विचार किया जा चुका है। यहां हम एक और समान रूप से महत्वपूर्ण तथा लगभग उसी तरह के उपाय के बारे में बता रहे हैं और Read more

भक्ति द्वारा ग्रह शांति

भक्ति द्वारा ग्रह शांति किसी भी उत्तम भवन को देखकर उसके निर्माता को प्रत्यक्ष न देखकर भी अनुभव के द्वारा उसके रचयिता का निश्चय होता है । दार्शनिक पद्धत्ति के अनुसार कोई भी कार्य ज्ञानवान, इच्छावान क्रियावान् कर्ता के बिना नहीं होता। इसी प्रकार अखिल ब्रह्माण्ड का कर्त्ता भगवान ही Read more

ज्योतिष तथा कर्म

ज्योतिष तथा कर्म कर्म संस्कृत का शब्द है, “कृ” से अर्थ है “कार्य या काम” । कोई भी मानसिक या शारीरिक कार्य कर्म कहलाता है। न्यूटन ने कहा था “प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है” । अतः कर्म के नियम के अनुसार अचानक कुछ नहीं होता तथा व्यक्ति पिछले या Read more

केतु का रत्न लहसुनिया कब, किसे व कैसे धारण करना चाहिए?

केतु-रत्न या लहसुनिया को लहसनिया, संस्कृत में सूत्रमणि अथवा वैदूर्य, फारसी में वंडर तथा अंग्रेजी में ‘कैट्स आई स्टोन’ (Cat’s Eye Stone) कहते हैं। इस मणि में सफेद धारियाँ पाई जाती हैं । दो, तीन अथवा चार धारियाँ होना साधारण बात है । परन्तु उत्तम कोटि का लहसनिया वह कहलाता Read more

राहु का रत्न गोमेदक कब, किसे व कैसे धारण करना चाहिए?

गोमेदक प्रमुखतः राहु का रत्न माना गया है। इसे फारसी में मेदक तथा अंग्रेजी में झिरकान (Zircon) कहते हैं। इसका रंग पीला-पीला-सा गोमूत्र के समान होता है, साथ ही इसमें श्यामला मिश्रित मधु की झाई भी दिखाई दे जाती है। यह अधिकतर चीन, बर्मा, अरब, सिंधु नदी के किनारे पाया Read more

शनि का रत्न नीलम कब, किसे व कैसे धारण करना चाहिए?

नीलम शनिदेव का प्रधान रत्न है। इसे संस्कृत में इन्द्रनीलमणि, हिन्दी में नीलम, फारसी में नीलविल याकूत और अंग्रेजी भाषा में सेफायर टरग्यूज (Sapphire Turguese) कहते हैं। अधिकतर नीलम हिमालय, विन्ध्य, आबू पर्वतों के अंचल में, लंका, काबुल, जावा आदि की ओर मिलता है । प्रत्येक वर्ण के लिए इस Read more

शुक्र का रत्न हीरा कब, किसे व कैसे धारण करना चाहिए?

संस्कृत में इसे वज्रमणि या इन्द्रमणि, हिन्दी में हीरा, फारसी में अलिमास और अंग्रेजी में डायमण्ड (Diamond) कहते हैं । यह रत्न-राज कहलाता है, क्योंकि अन्य समस्त रत्नों में यह दुर्लभ और कीमती होता है । समस्त देवतागण इसे धारण करते हैं। भाग्यवान देशों में ही इसकी खानें होती हैं Read more

बृहस्पति का रत्न पुखराज कब, किसे व कैसे धारण करना चाहिए?

संस्कृत में इसे पुष्पराग, हिन्दी में पुखराज या पुषराज, फारसी में जर्द याकूत, अंग्रेजी भाषा में टोपे (Topaz) कहते हैं। यह मुख्यतः लंका, उड़ीसा तथा बंगाल के अंचलों में, ब्रह्मपुत्र के आसपास और विन्ध्य तथा हिमालय पहाड़ के अंचल में पाया जाता है । यह मुख्यतः पाँच रंगों में पाया Read more

बुध का रत्न पन्ना कब, किसे व कैसे धारण करना चाहिए?

पन्ना बुध ग्रह का रत्न कहा गया है। इसे संस्कृत में मरकत मणि, फारसी में जमरन, हिन्दी में पन्ना और अंग्रेजी में एमराल्ड (Emerald) कहते हैं। इसका रंग हरा होता है तथा अधिकतर दक्षिण महानदी, हिमालय, गिरनार और सोमनदी के पास पाया जाता है। इस रत्न को धारण करने वाले Read more

मंगल का रत्न मूंगा कब, किसे व कैसे धारण करना चाहिए?

इसे संस्कृत में विद्रुम, फारसी में मिरजान और अंग्रेजी में कोरल (Coral) कहते हैं । इसका स्वामी मंगल है। हिमालय पहाड़ और मानसरोवर के पास यह पाया जाता है। मूँगा मुख्यतः चार रंग का होता है -लाल, सिन्दूरी, हिंगुले के रंग-सा और गेरुआ। मूंगे के गुण प्रत्येक प्रकार के मूंगे Read more