ग्रहों के फल का एक लग्न मात्र से फल न कहकर तीनों लग्नों लग्न, सूर्यलग्न, चन्द्रलग्न से विचार कर कहने का नाम ‘सुदर्शन’ पद्धति है ।

स्पष्ट ही है कि जब कोई ग्रह न केवल लग्न से ही शुभ अथवा योगकारक बनता हो बल्कि सूर्यलग्न तथा चन्द्रलग्न से भी शुभ अथवा योगकारक बनता हो तो उसमें साधारण से कम से कम तीन गुणा अधिक शुभता आवेगी अतः इस पद्धति का आदर करना धनकी मात्रा तथा पदवी की उच्चता आदि को देखने के लिए अनिवार्य है ।

एक वार एक कुण्डली का फल कहते हुए हम ने कर्क लग्न के लिए शनि की भुक्ति पर विचार किया। शनि साधारण स्थिति में था अतः हमारा विचार था कि जैसा कि कर्क लग्न वालों को होना चाहिये शनि सप्तमेश अष्टमेश होने के कारण अशुभ फल देगा परन्तु व्यक्ति से पता चला कि शनि ने तो उसको बहुत धन, मान, पदोन्नति आदि अपनी भुक्ति में दिया ।

इस वास्तविकता को देख कर हमने कुण्डली पर पुनः विचार किया और सुदर्शन में देखा तो सूर्य तुला में और चन्द्र वृषभ में पड़ा हुआ था तब हमको पताचला कि शनि दो लग्नों से तो योगकारक का फल कर रहा है अर्थात् सूर्य लग्न तथा चन्द्र लग्न से और केवल एक लग्न से शनि अनिष्ट फल दे रहा है।

इस प्रकार जब तीनों लग्नों में से अधिक लग्नों को एक ही प्रकार का फल देने वाला पाया जावे तो फल ‘बहु संख्या’ (Majority) के नियम के आधार पर कहना चाहिये।

इस संदर्भ में इतना और उल्लेख कर देना उचित होगा कि लग्नों के दो विभाग किये जा सकते हैं। एक विभाग में रखिये सूर्य, चन्द्र, मङ्गल तथा गुरु को और दूसरे विभाग में बुध, शुक्र तथा शनि को, यदि तीनों की तीनों लग्ने सूर्य, चन्द्र, मङ्गल अथवा गुरु की राशियों की हों अथवा तीनों की तीनों लग्नें बुध, शुक्र अथवा शनि की राशियों की हों तो अपने २ विभाग के शुभ तथा योग कारक ग्रहों का फल अतीव श्रेष्ठ तथा उत्तम दर्जे का होगा ।

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उदाहरण के लिए मुख्यमन्त्री राजस्थान श्री सुखाडिया की कुं० सं० 1 को देखिये ।

सुदर्शन तथा धनबाहुल्य
कुं० सं० 1

यहाँ लग्न गुरु की राशि की है । चन्द्र सूर्य की राशि में स्थित है और सूर्य चन्द्र की राशि में पड़ा हुआ है । इस प्रकार तीनों लग्नें एक ही विभाग (सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, वृहस्पति) के अन्दर पाई गई । इस विभाग में शुभ ग्रह तथा योग कारक यही सूर्यादि चार ग्रह हैं । अतः यह सब ग्रह अपनी अपनी भुक्ति में धन, मान, पदवी देते हैं । चन्द्र इस कुण्डली में यद्यपि शुभ फलदायक है तो भी चूंकि पाप मध्यत्व में है तथा शनि तथा राहु से दृष्ट है अतः दूसरे ग्रहों सूर्य मङ्गल, गुरु की अपेक्षा कम शुभ है.।

श्री पं० जवाहर लाल की कुंडली सं० 2 में भी लग्न, चन्द्र लग्न तथा सूर्य लग्न एक ही विभाग के हैं । अतः मङ्गल आदि योगकारकों का फल असाधारण रूप से घटित हुआ आप देख रहे हैं, मङ्गल, दशमस्थ निज राशि मेष को पूर्ण अष्टम दृष्टि से देख रह है और उसी दशम भाव पर तीन शुभ ग्रहों बुध शुक्र तथा बृहस्पति की भी पूर्ण दृष्टि है ।

अतः शुभ कर्मों तथा शासन का यह दशम घर पण्डित जी की कुडली में असाधारण रूप से बली है जिसके फलस्वरूप पण्डित जी ने १६ वर्ष तक भारत की जनता पर उसका स्नेहपात्र होकर राज्य किया । निष्कर्ष यह कि एक विभाग ही में तीनों लग्ने आजाने की सूरत में शुभता कई गुना बढ़ जाती है ।

कुं० सं० 1

सुदर्शन पद्धति का प्रयोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किया जा सकता है । उपरोक्त विवेचन द्वारा ‘सुदर्शन पद्धति’ की धन की मात्रा तथा पदवी की प्रगति आदि के देखने में उपयोगिता सिद्ध हो चुकीं होगी ।

हम समझते हैं कि इस पद्धति का अनुसरण किये बिना ज्योतिष के किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं प्राप्त की जा सकती, अतः हम पाठकों से अनुरोध करेंगे कि वे इस पद्धति को शीघ्र अपनाएं और ज्योतिष की किसी भी बात का निर्णय देने से पूर्व इस पद्धति द्वारा विचार करलें ।

व्यवसाय का चुनाव और आर्थिक स्थिति

  1. कुण्डली की वैज्ञानिक व्याख्या
  2. ग्रहों का व्यवसाय पर प्रभाव
  3. पाराशरीय धनदायक योग 
  4. लग्नो के विशेष धनादायक ग्रह
  5. धन प्राप्ति में लग्न का महत्त्व 
  6. विपरीत राजयोग से असाधारण धन
  7. नीचता भंग राजयोग
  8. अधियोग से धनप्रप्ति
  9. स्वामिदृष्ट भाव से धनप्रप्ति
  10. कारकाख्ययोग से धनप्रप्ति
  11. सुदर्शन तथा धनबाहुल्य
  12. शुक्र और धन 
  13. जातक का व्यवसाय
  14. मित्र, भाई यॉ सम्बंधी – किससे धन लाभ होगा ?
  15. धन कब मिलेगा ?
  16. व्यव्साय चुनने की पध्दति
  17. धन हानि योग

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