विपरीत राजयोग से असाधारण धन

1. जब शुभ घरों के स्वामी बली होते हैं तो धन मिलता है । इस सिद्धान्त का विवेचन आप पढ़ चुके हैं। परन्तु ऐसा भी देखा गया है कि प्रचुर धन की प्राप्ति अनिष्ट भावों के स्वामियों की निर्बलता से भी होती है। बल्कि धन की इस सिद्धान्त के फलस्वरूप प्राप्ति ‘शुभ बली’ ग्रहों की प्राप्ति से कहीं अधिक होती है।

2. कुण्डली में षष्ठ, अष्टम तथा द्वादश अनिष्टदायक स्थान हैं। इन तीन स्थानों को त्रिक’ कहते हैं । किसी त्रिक स्थान का स्वामी किसी अन्य त्रिक स्थान में अथवा अन्यत्र भी जब पाप युति अथवा दृष्टि द्वारा अतीव निर्बल होता है तो राजयोग की प्राप्ति होती है। छठा स्थान ऋण का है। यदि किसी का लाखों का ऋण एकदम किसी व्यक्ति द्वारा उतार दिया जाय तो उसको ऋण से छुटकारा भी मिलता है और अपने धन का उत्पादनपरक प्रयोग भी । इसी प्रकार अष्टम स्थान ‘दरिद्रता’ का है ।

यदि मनुष्य की दरिद्रता का नाश हो जाये तो धन की उत्पत्ति तो उद्दिष्ट है ही । इसी प्रकार द्वादश भाव व्यय आदि का है। यदि किसी के धन के नाश का नाश हो जावे तो उसे धन की प्राप्ति ही समझना चाहिये । दो नकार एक सद्भाव की सृष्टि करते हैं (Two Negatives make one Positive)।

3. उपरोक्त तथ्य को ‘विपरीत राजयोग’ की परिभाषा करते हुए ‘देवकेरल’ के रचयिता लिखते हैं :-

“रन्ध्र शे व्यय षष्ठगे रिपुपतौ रंध्रे व्यये वा स्थिते रक्केऽपि तथैव रन्ध्ररिपुगे यद्वा वयः स्वगा । सर्वेऽन्योन्य ग्रहाश्रिता यदि ग्रहाः युक्तेक्षिता तत्र हि जातो भूमिपातिः प्रशस्तविभवो राजाधिराजस्ततः” ।।

अर्थ – अष्टमेश व्यय अथवा षष्ठ में हो, षष्ठेश, अष्टम अथवा द्वादश में हो, द्वादशेश इसी प्रकार छठे अथवा आठवें भाव में स्थित हो अथवा स्वक्षेत्री होकर परस्पर प्रभाव में हों अर्थात् किसी अन्य के प्रभाव में न हों तो महान यशस्वी वैभव से युक्त राजा बल्कि राजाओं का भी राजा होता है।

4. एक ‘विपरीत राज योग’ का उदाहरण नीचे दिया जा रहा है । यह एक लखपति की कुण्डली है।

कु० सं० 1
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यहाँ षष्ठाधिपति शनि नीच भी है, अष्टम में भी है, राहु से युक्त तथा सूर्य से जोकि द्वादशाधिपति है, दृष्ट भी है और किसी अन्य ग्रह द्वारा दृष्ट-युत नहीं । इसी प्रकार सूर्य भी द्वादश स्थानाधिपति है – अपने भाव से तृतीय में नीच है, केतु से युक्त शनि से दृष्ट है और सूर्य के ऊपर अन्य कोई दृष्टि नहीं है । इस प्रकार षष्ठ तथा द्वादश के अनिष्ट के नाश द्वारा उत्तम ‘विपरीत राजयोग’ की सृष्टि हुई जोकि लाखों रुपये देती है ।

5. निम्नलिखित कु० सं० 2 में भी ‘बुध’ द्वारा ‘विपरीत राजयोग’ की सृष्टि हुई है, क्योंकि बुध यहाँ तृतीयेश तथा षष्ठेश है अर्थात् दो अशुभ स्थानों का स्वामी है ।

कु० सं० 2

वह बुध तृतीय से षष्ठ तथा षष्ठ से तृतीय अर्थात् तृतीय तथा षष्ठ अपनी दोनों राशियों से गिनने पर अनिष्ट स्थान में स्थित है । पुनः बुध शत्रु राशि में भी स्थित है और केतु पापी ग्रह द्वारा दृष्ट है। किसी शुभ ग्रह द्वारा न युक्त है न दृष्ट । अतः केवल बुध ही इस व्यक्ति को लाखोंपति बनाने के लिये पर्याप्त है । यद्यपि द्वितीयेश, लग्नेश-लाभेश की युति रूप में ‘महाधन योग’ भी उपस्थित है ।

6. एक और करोड़पति की कुण्डली जिसमें विपरीत राजयोग विद्यमान है नीचे कुण्डली सं० 3 के रूप में दी जा रही है। इस कुण्डली में छठे भाव का स्वामी गुरु तथा तृतीय एवं द्वादश स्थान का स्वामी बुधं दोनों सूर्य के साथ अस्त तथा अष्टमाधिपति पापी शनि से पूर्णतया दृष्ट हैं । उन पर पापी राहु की भी पूर्ण नवम दृष्टि है, और उन पर किसी शुभ ग्रह की युति अथवा दृष्टि नहीं है ।

कुण्डली सं० 3

गुरु और बुध की ऐसी निर्बल स्थिति के कारण तृतीय, षष्ठ, द्वादश त्रिक भावों का अनिष्ट एवम् अभाव पूर्णतया नष्ट हो गया जिसके फल- स्वरूप ‘विपरीत राज योग’ नाम के उलटे परन्तु अत्यन्त लाभदायक लक्ष्मीदायक करोड़पति बनाने वाले योग की सृष्टि हुई ।

7. इस प्रकार जहाँ ज्योतिष के विद्यार्थी को द्वितीय, नवम आदि शुभ भावों के स्वामियों की शुभता तथा बल की तलाश करनी है वहाँ तृतीय, षष्ठ, अष्टम, द्वादश भावों के स्वामियों की अशुभता तथा निर्बलता की भी खोज करनी होगी ताकि धनदायक सभी स्रोतों का पूर्ण ज्ञान हो सके ।

व्यवसाय का चुनाव और आर्थिक स्थिति

  1. कुण्डली की वैज्ञानिक व्याख्या
  2. ग्रहों का व्यवसाय पर प्रभाव
  3. पाराशरीय धनदायक योग 
  4. लग्नो के विशेष धनादायक ग्रह
  5. धन प्राप्ति में लग्न का महत्त्व 
  6. विपरीत राजयोग से असाधारण धन
  7. नीचता भंग राजयोग
  8. अधियोग से धनप्रप्ति
  9. स्वामिदृष्ट भाव से धनप्रप्ति
  10. कारकाख्ययोग से धनप्रप्ति
  11. सुदर्शन तथा धनबाहुल्य
  12. शुक्र और धन 
  13. जातक का व्यवसाय
  14. मित्र, भाई यॉ सम्बंधी – किससे धन लाभ होगा ?
  15. धन कब मिलेगा ?
  16. व्यव्साय चुनने की पध्दति
  17. धन हानि योग

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