भावार्थ रत्नाकर | तीर्थ स्नान | मृत्यु योग

भावार्थ रत्नाकर | अध्याय 10 | तीर्थ स्नान 1. कर्मकारक देवेन्द्र पूजयस्य यदि विद्यते । संबन्ध कर्मनाथेन सत्कर्मनिरतो भवेत् ॥ १ ॥ भावार्थ – कर्मों के कारक गुरु का यदि युति दृष्टि आदि से दशम भाव के स्वामी से सम्बन्ध हो, तो जातक सदा सत्कर्म करने वाला होता है । Read more

भावार्थ रत्नाकर | भाग्य योग | राज योग

भावार्थ रत्नाकर | अध्याय 8 | भाग्य योग 1. भाग्माधिपो लाभगे वा लाभेशो भाग्यगो यदि । लाभ भाग्याधिपत्योश्च संबन्धे भाग्यमादिशेत् ॥ १ ॥ भावार्थ – यदि नवम भाव का स्वामी एकादश भाव में हो अथवा एकादश भाव का स्वामी नवम में हो अथवा उनमें युति दृष्टि आदि से परस्पर संम्बन्ध Read more

भावार्थ रत्नाकर | स्त्री और काम | आयु और स्वास्थ्य

भावार्थ रत्नाकर | अध्याय 6 | स्त्री और काम 1. कलत्राधिपतिर्यस्तु कारकेण युतो यदि । क्रूरसंबन्ध रहितः कलत्रं चैकमेव हि ॥ १ ॥ भावार्थ – सप्तम भाव का स्वामी क्लत्र कारक शुक्र के साथ यदि (पुरुष की जन्म कुण्डली में) हो और उस पर क्रूर ग्रहों का किसी प्रकार से Read more

भावार्थ रत्नाकर | भ्रातृ-भाव | वाहन तथा भाग्य | शत्रु-रोग

भावार्थ रत्नाकर | अध्याय 3 | भ्रातृ-भाव 1. भ्रातृस्थानेश्वरस्यापि भ्रातृणां कारकेण वै। कूजेन सह संबन्धे भ्रातृ द्विस्वीरिता ॥ १ ॥ भावार्थ – यदि तृतीय भाव का स्वामी भ्रातृकारक मंगल के साथ युति अथवा दृष्टि से सम्बन्धित हो, तो भाइयों की संख्या आदि की वृद्धि का सूचक है। व्याख्या – तृतीयेश Read more

भावार्थ रत्नाकर | धन योग | निर्धनता के योग | खान-पान

भावार्थ रत्नाकर | अध्याय 2 | धन योग 1. धनेशे पञ्चमस्थे च पञ्चमेशो घने यदि । धनपे लाभगे वापि लाभेशो धनगो यदि । पञ्चमेश पंचमे वा भाग्ये भाग्याधिपो यदि । विशेष धन योगाश्चेत्याहुर्जातकको विदाः ॥ १,२ ॥ भावार्थ – यदि द्वितीयेश और पंचमेश में स्थान परिवर्तन हो या द्वितीयेश लाभ Read more

भावार्थ रत्नाकर | मकर लग्न | कुंभ लग्न

मकर लग्न 1. मकरे जायमानस्य अष्टमस्थो भवेद्बधः । लग्नसंस्थो यदि गुरु शुक्रेण च निरीक्षितः । दीर्घायुर्योगमाप्नोति जातस्तत्र न संशयः । निर्धनश्च भवेज्नातोद्यत्रापि च न संशयः ॥ १,२ ॥ भावार्थ – यदि मकर लग्न हो, बुध अष्टम भाव में हो और लग्न में स्थित गुरु पर शुक्र की दृष्टि हो, तो Read more

भावार्थ रतनाकर | धनु लग्न | मीन लग्न

धनु लग्न 1. धनुर्लग्ने तु जातस्य पञ्चमस्थ शनेर्दशा । शुभप्रदायोगदेति वदन्ति विभुदोत्तमाः ॥ १ ॥ भावार्थ – पंचम भाव में मेष राशि में स्थित शनि की दशा में धनादि प्राप्ति का शुभ फल होता है । व्याख्या – शनि की मूल त्रिकोण राशि तृतीय भाव में पड़ती है। शनि ने Read more

भावार्थ रत्नाकर | कर्क लग्न | सिंह लग्न

कर्क लग्न 1. कर्किजातस्य च गुरुविशेषेण न योगदः । मकरे जायमानस्य बुधो योगप्रदो भवेत् ॥ १ ॥ भावार्थ – कर्क लग्न के जातकों के लिए गुरु कोई विशेष धनदायक सिद्ध नहीं होता, परन्तु मकर लग्न वालों के लिए बुध विशेष धनदायक होता है । व्याख्या – ग्रन्थकार का अभिप्राय मूल Read more

भावार्थ रत्नाकर | मिथुन लग्न | कन्या लग्न

मिथुन लग्न 1. तृतीयस्थौ रविबुध बुधचाये समागमे । बुधो योगप्रदस्सत्यं युग्मजातस्य भाग्यदः ॥१॥ भावार्थ – यदि मिथुन लग्न में जन्म हो और सूर्य और बुध तृतीय भाव में स्थित हों, तो बुध अपनी दशा भुक्ति में बहुत धनदायक आदि सिद्ध होता है। व्याख्या – बुध के सम्बन्ध में मौलिक बात Read more

भावार्थ रत्नाकर | वृषभ लग्न | तुला लग्न

वृषभ लग्न 1. वृषभजातस्य च शनिः भाग्यकर्मेश्चरोऽपि वा । सोमसुताभ्याम् वा न युक्रतौ नैव योगदः ॥ १ ॥ भावार्थ – वृषभ लग्न में जन्म हो, तो शनि केन्द्र (दशम) तथा त्रिकोण (नवम) का स्वामी होता हुआ भी योग (बहुत शुभ) फल नहीं दे सकता, यदि इसके साथ सूर्य तथा बुध Read more