जातक का व्यवसाय
मनुष्य का व्यवसाय ‘Profession’ क्या है यह एक बहुत जटिल प्रश्न है। ज्योतिष शास्त्रकारों ने बहुधा कर इस प्रश्न पर विचार करने के लिये दशम भाव की ओर संकेत किया है।
वराह मिहिर आचार्य तथा इसी प्रकार अन्य प्रतिष्ठित विद्वानों का कहना है कि जो ग्रह दशम स्थान में हो वह मनुष्य की आजीविका को बतलाता है।
यह दशम स्थान सभी लग्नों से दशम हो सकता है अर्थात् लग्न से दशम में स्थित ग्रहों से, सूर्य लग्न से दशम भाव में स्थित ग्रहों से तथा चन्द्र लग्न से दशम स्थान में स्थित ग्रहों के स्वभाव गुण आदि से मनुष्य की आजीविका कहनी चाहिये ।
वराह मिहिर आचार्य ने पुनः कहा है कि पण्डित लोगों को वृत्ति अर्थात् व्यवसाय (Profession) का विचार दशम भाव का स्वामी जिस नवाँश में स्थित हो उस नवांश के स्वामी के अनुरूप करना चाहिये ।
परन्तु बहुधा उपर्युक्त नियम व्यवहार में लाभकारी सिद्ध नहीं होता, ऐसी न केवल हमारी ही सम्मति है अपितु अन्य कई विद्वानों का भी ऐसा ही अनुभव है ।
ईश्वर की विकासात्मक योजना (Evolutionary Plan) में दशम स्थान कर्मों का अवश्य है परन्तु इन कर्मों से तात्पर्य नैतिक अथवा अनैतिक अच्छे अंथवा बुरे, परोपकार के अथवा बलात्कार के कर्मों से है । दूसरे शब्दों में दशम भाव संबन्धी कर्मों का संबन्ध धर्म से, भावना (Motive) से तथा उनकी यज्ञीय अथवा अयज्ञीय प्रकृति से है न कि रुपया कमाने के कर्मों से है ।
अतः हम समझते हैं कि ज्योतिष के पण्डितों को इस विषय में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। उन्हें चाहिये कि ज्योतिष शास्त्र का मार्ग प्रशस्त करने के लिये अपने अनुसन्धान तथा अनुभव के आधार पर कोई ऐसी पद्धति संसार के सामने उपस्थित करें जिस से आधुनिक युग के बहुसंख्यक एवं भिन्न-भिन्न धन्धों व्यवसायों के सम्बन्ध में कोई निश्चयात्मक परिणाम निकल सके ।
उपर्युक्त उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हम निम्नलिखित पंक्तियाँ व्यवसाय (Profession) के सम्बन्ध में लिख रहे हैं । हमारा आग्रह यह नहीं है कि हमने इस सन्दर्भ में कोई अन्तिम निर्णय दे दिया है। हमने तो केवल अपने अनुसन्धानात्मक अनुभव को युक्ति पूर्ण ढंग से तथा शास्त्र के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जनता की सेवा में उपस्थित किया है।
हमारा अनुरोध केवल इतना है कि इस पद्धति का जिस का कि हम आगे उल्लेख करेंगें आप निष्पक्ष रूप से परीक्षण करें और यदि आप को उसमें कुछ तथ्य प्राप्त हों तो उस से लाभ उठावें ।
सब से पहली बात जो इस सन्दर्भ में हम कहना चाहते हैं वह यह है कि अन्य अंगों के साथ-साथ शास्त्रकारों ने लग्न का भी आजीविका से घनिष्ठ सम्बन्ध माना है । इस सत्य के उदाहरण आप को प्रत्येक ज्योतिष के प्रामाणिक ग्रन्थ जैसे बृहतजातक, वृहत्पाराशर, सर्वार्थ चिन्तामणि आदि से मिल जावेगें ।
हम समझते है कि बहुत हद तक दशम भाव में स्थित ग्रहों के अध्ययन से भी आजीविका के प्रश्न का निर्णाय किया जा सकता है परन्तु इसका कारण यह नहीं समझना चाहिये कि उक्त ग्रहों का प्रभाव दशम भाव पर पड़ रहा है। उस प्रभाव के होते हुये भी वृत्ति (Profession) में अंग (Factor) होने का कारण यह है कि अपनी उस दशम केन्द्र स्थिति से वे ग्रहलग्न को भी प्रभावित करते हैं जैसा कि हम अध्याय ‘कारकाख्य योग से महान् धन’ में दिखला चुके हैं।
केन्द्र स्थित ग्रहों का लग्न पर प्रभाव पड़ता है और यह बात तो फिर स्पष्ट ही है कि सब से उत्तम एवं बलवान दशम केन्द्र में स्थित ग्रह का प्रभाव लग्न पर अतीव अधिक होगा ।
निष्कर्ष यह है कि दशमस्थ ग्रहों के लग्न पर प्रभाव ही के कारण उनकी आजीविका के प्रश्न में उपयुक्तता है न कि इस लिये कि वे केन्द्रस्थान में हैं अथवा उस स्थान को प्रभावित कर रहे हैं।
इतना स्पष्ट कर देने के अनन्तर कि लग्न से धन्धा या आजीविका देखी जाती हैं हम यह कहेंगे कि इस विषय में हो सकता है कि केवल लग्न मात्र से यदि आप विचार करें तो आप ठीक परिणाम पर न पहुँच सकें। लग्न के साथ-साथ आप को सूर्य लग्न तथा चन्द्र लग्न पर भी ग्रहों का प्रभाव देखना होगा।
दूसरे शब्दों में आजीविका का निर्णय तीनों लग्नों तथा उनके स्वामियों पर पाये गये प्रभाव द्वारा करना चाहिये ।
इस पद्धति का अनुसरण करते हुए हमें देखना होगा कि वह कौन सा ग्रह है जो अधिक लग्नों अर्थात लग्न, लग्नेश, चन्द्रलग्न चन्द्र-लग्नेश, सूर्य लग्न सूर्य-लग्नेश में अधिकांश पर अपनी युति अथवा दृष्टि द्वारा अथवा अन्य ग्रहों से मिलकर प्रभाव डाल रहा है। लग्नों पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाला ग्रह व्यवसाय का द्योतक होगा ।

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
परन्तु इस सन्दर्भ में यह बतला देना अत्यन्त आवश्यक है कि प्रायः वह ग्रह जिसका प्रभाव दूसरे ग्रहों की अपेक्षा लग्नों पर अधिक पड़ रहा हो सीधे रूप से अपने ही स्वरूप से व्यवसाय को नहीं बतलावेगा बल्कि अपने तथा उन ग्रहों के सांझे स्वरूप द्वारा बतलावेगा जिन का कि प्रभाव उन लग्नों पर अधिकतम प्रभाव डालने वाले ग्रह पर पड़ रहा होगा ।
जैसा कि बहुधा हमारे अनुभव में आया है कि पंचमेश यदि पुरुष ग्रह हो परन्तु यदि स्त्री ग्रहों के प्रभाव में हो तो स्त्री सन्तान के देने वाला होता है। इसी प्रकार यदि पंचमेश स्वयं स्त्री ग्रह हो परन्तु पुरुष ग्रहों के प्रभाव में हो तो पुरुष सन्तान को देता है।
इससे प्रतीत होता है कि अन्य प्रभाव द्वारा ग्रहों का स्वरूप सर्वथा बदल जाता है । इसी सिद्धान्त को दृष्टि में रखते हुए हम व्यवसाय के सन्दर्भ में भी कह सकते है कि वह ग्रह जो कि सबसे अधिक प्रभाव लग्नों पर डाल रहा है स्वयं अपने स्वरूप व्यवसाय के स्वरूप को न दरसा कर उन ग्रहों द्वारा बतलावेगा जिनका कि प्रभाव उन लग्नों पर अधिक प्रभाव डालने वाले ग्रह पर पड़ रहा होगा’ और उस प्रभाव का निर्णय ग्रहों के साझे (Common) धर्म से होगा ।
अब हम, सुदर्शन पद्धति का अनुसरण करते हुए लग्नों पर प्रभाव का विचार कैसे किया जाय, सब से अधिक प्रभाव लग्नों पर किस ग्रह का है यह कैसे निर्णय किया जाय तथा अधिकतम प्रभाव वाले ग्रह पर पुनः किन ग्रहों का प्रभाव तथा कैसा प्रभाव है आदि प्रश्नों का विवेचन उदाहरणों द्वारा करेंगे ताकि व्यवसाय निर्णय का प्रश्न सुगम हो जावे ।
निम्न लिखित कुण्डली सं० 1 एक व्यक्ति की है जोकि बिजली के सामान को बेचने तथा इसे राज्य को सप्लाई करने का काम करता है ।

- यहाँ लग्न पर शनि, शुक्र, मंगल (राशि द्वारा), का प्रभाव है ।
- लग्नेश मंगल है उस पर राहु द्वारा चन्द्र का प्रभाव है ।
- सूर्य लग्न पर बुध, मंगल, पुनः मंगल (मंगल की राशि मेष द्वारा), गुरु, चन्द्र तथा शनि का प्रभाव है ।
- सूर्य पर मंगल, पुन: मंगल, गुरु, चन्द्र, शनि का प्रभाव है।
- सूर्य लग्न का स्वामी मंगल है उस पर बुध, चन्द्र, का प्रभाव है।
प्रभाव डालने वाले ग्रहों के प्रभाव का वर्गीकरण शनि के पाँच, शुक्र का एक, मंगल के छः, चन्द्र के तीन, बुध का एक, गुरु के तीन ।
यहाँ मंगल का अत्यधिक प्रभाव लग्नों पर है अतः मंगल आजीविका का निर्णय करेगा। मंगल एक तो अग्निमय ग्रह पुनः लग्न, जो कि आग का घर है, का स्वामी: तीसरे सूर्य अधिष्ठित राशि का स्वामी होने से भी आग अथवा बिजली बना।
यह मंगल एकादश स्थान में स्थित है जोकि राज्य का द्वितीय स्थान है अर्थात् राज्य का धन स्थान; धन में सामान भी शामिल होता है अतः राज्य के स्टोर सामान से सम्बन्धित बिजली का सामान देना और उससे आजीविका कमाना युक्तियुक्त एवम् सुदर्शन से सिद्ध हुआ ।
आगे कुण्डली सं० 2 एक आफिसर की है जोकि रक्षा लेखा विभाग में एक उच्चपदाधिकारी, क्लास वन, आफिसर है ।

- यहाँ ‘लग्न’ पर गुरु मंगल, शनि, सूर्य, बुध, का,
- लग्नेश गुरु परं सूर्य, बुध, चन्द्र, मंगल, शनि का;
- चन्द्र लग्न पर शुक्र, गुरु, सूर्य बुध, का,
- चन्द्रलग्न के स्वामी शुक्र पर सूर्य, बुध, केतु, शनि, का;
- सूर्य लग्न पर मंगल, बुध, शनि, चन्द्र, गुरु, का,
- सूर्य लग्नाधिपति मंगलपर सूर्य, बुध, शनि का (पार्श्व दृष्टि द्वारा) प्रभाव है ।
ग्रहों के लग्नों पर प्रभाव का वर्गीकरण :- मंगल के चार, शनि के पाँच, सूर्य के पांच, बुध के छः, चन्द्र के दो, शुक्र के दो, गुरु के चार प्रभाव पाये गये । बुध का सब से अधिक प्रभाव है । अतः हिसाब किताब का कार्य उपयुक्त है।
बुध पर अत्यधिक प्रभाव केवल मंगल का है। क्योंकि बुध मंगल की राशि में भी है तथा मगल द्वारा दृष्ट भी है । अतः लेखा जोखा रक्षा विभाग (जो मंगल तथा मंगल के सूर्य अधिष्ठित राशि का स्वामी होने से प्रमाणित होता है) से सम्बन्ध रखता है ऐसा स्पष्ट दीख रहा है ।
निम्नलिखित कुण्डली सं० 3 एक और क्लास वन आफिसर की है । लग्नों पर प्रभाव इस प्रकार है :-

- लग्न – चन्द्र और बृहस्पति का ।
- लग्नेश – चन्द्र, बुध सूर्य, बुध, गुरु, मंगल
- चन्द्र लग्न – बुध, सूर्य, बुध, मंगल (राशि द्वारा) ।
- चन्द्र लग्नेश – बुध, सूर्य, गुरु ।
- सूर्य लग्न – बुध, चंद्र, गुरु (राशि द्वारा)
- सूर्य लग्नेश – गुरु, सूर्य, बुध, शनि, मंगल, शुक्र (केतु द्वारा)
ग्रहों के लग्नों पर प्रभाव का वर्गीकरण – सूर्य के चार, चंद्र के तीन, मंगल के तीन, बुध के सात, गुरु के पांच, शुक्र एक तथा शनि एक; कुल 24 ।
बुध के सबसे अधिक संख्या में (7) प्रभाव निकले । अतः आजीविका बुध से संबन्धित होनी चाहिए । बुथ पर सूर्य तथा चन्द्र का प्रभाव है जोकि लेखा को राज्य से संबन्धित करता है।
बुध का चूँकि दशम से तृतीय तथा लग्न से तृतीय भाव से संबन्ध है (इन भावों का स्वामी होने के कारण) और इन भावों में साझी बात यह है कि दोनों ‘सेना’ विभाग के स्थान हैं अतः रक्षा विभाग में लेखे जोखे द्वारा आजीविका का उपार्जन करना युक्ति से सिद्ध हुआ ।
व्यवसाय का चुनाव और आर्थिक स्थिति
- कुण्डली की वैज्ञानिक व्याख्या
- ग्रहों का व्यवसाय पर प्रभाव
- पाराशरीय धनदायक योग
- लग्नो के विशेष धनादायक ग्रह
- धन प्राप्ति में लग्न का महत्त्व
- विपरीत राजयोग से असाधारण धन
- नीचता भंग राजयोग
- अधियोग से धनप्रप्ति
- स्वामिदृष्ट भाव से धनप्रप्ति
- कारकाख्ययोग से धनप्रप्ति
- सुदर्शन तथा धनबाहुल्य
- शुक्र और धन
- जातक का व्यवसाय
- मित्र, भाई यॉ सम्बंधी – किससे धन लाभ होगा ?
- धन कब मिलेगा ?
- व्यव्साय चुनने की पध्दति
- धन हानि योग
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